शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

कानपुर का इतिहास-1
कानपुर किसी हिंदू सिंह या झण्डू सिंह ने नहीं बसाया। इसे अंग्रेजों ने बसाया। वह भी सामरिक दृष्टि से इसकी अहमियत को देखते हुए ईस्ट इंडिया कंपनी के अंग्रेजों ने। 1764 में बक्सर की लड़ाई हारने के बाद शाहआलम ने 40 हजार वर्गमील का दोआबा अंग्रेजों को सौंपा और शुजाउद्दौला ने अवध का एक बड़ा भूभाग तथा मीरकासिम बंगाल की दीवानी खो बैठा। इसी दोआबे में पड़ता था कानपुर का इलाका जो तब वीरान था। बस गंगा का किनारा था और जाजमऊ, सीसामऊ, नवाबगंज, जुही और पटकापुर ये पांच जागीरदारियां थीं। इनमें सेनवाबगंज व पटकापुर ब्राह्मणों के पास, जुही ठाकुरों के पास, सीसामऊ खटिकों के पास और जाजमऊ बनियों की जागीरदारी में था। इनमें से जुही की जागीरदारिनी रानी कुंअर और नवाबगंज के बलभद्र प्रसाद तिवारी ने अपने-अपने इलाकों में बड़े काम किए। रानी कुंअर द्वारा दी गई माफी के पट्टे तो आज भी जुही वालों के पास हैं। अंग्रेज पहले अपनी छावनी हरदोई के पास ले गए फिर उन्हें लगा कि सामरिक दृष्टि से बेहतर तो जाजमऊ परगना है और वे अपनी छावनी जाजमऊ ले आए। फिर नवाबगंज परगने के परमट इलाके में कलेक्टर बिठा दिया साल 1803 में। 
कानपुर का इतिहास-2
1764 में बक्सर की लड़ाई में शुजाउद्दौला, शाहआलम और मीरकासिम की साझा फौजों को हराने के बाद अंग्रेज पहले बिलग्राम गए और तय हुआ कि अपनी छावनी यहीं डाली जाए। मगर बिलग्राम से वे शुजाउद्दौला पर नजर नहीं रख सकते थे। वहां के पठान अंग्रेजों के मित्र थे इसलिए उन्होंने शुजाउद्दौला को घेरने की नीयत से जाजमऊ के निकट सरसैया घाट के किनारे छावनी डालने का तय किया। अगले ही साल यानी 1765 में ईस्ट इंडिया कंपनी के गोरे सरसैया घाट आ गए। तब तक सरसैया घाट का पंडा शिरोमणि तिवारी को
 ओरछा नरेश ने बहुत सारी माफी की जागीर दे रखी थी क्योंकि जमनापार के नहानार्थी सरसैया घाट ही गंगा स्नान करने आते थे। सचेंडी के राजा द्वारा कानपुर, कर्णपुर अथवा कान्हपुर बसाए जाने का कहीं कोई सबूत नहीं मिलता। यूं भी सचेंडी राजा अल्मास अली और उसके भाई राजा भागमल जाट का ही कोई कारिंदा रहा होगा क्योंकि कानपुर का अंतिम हिंदू राजा अल्मास अली ही बताया जाता है। मैं एक बार सचेंडी गया था तब वहां किला भग्नावस्था में मौजूद था और राजा के वंशज अत्यंत दीनहीन अवस्था मेें थे। वे एक पीसीओ और फोटोग्राफी की दूकान चलाते थे। सचेंडी का यह किला कालपी रोड से जमना साइड चलने पर दो किमी अंदर है। कालपी रोड अब बारा जोड़ के बाद से एनएच-2 कहलाने लगा है।
1765
में ब्रिगेडियर जनरल कारनाक ने कोड़ा जहानाबाद में नवाब-वजीर शुजाउद्दौला और उसके मराठा सहायक मल्हार राव को हरा दिया। शुजाउद्दौला कालपी की तरफ भागा और जाजमऊ के किले में अपने 14-15 साथी छोड़ गया। बाद में शुजाउद्दौला फर्रुखाबाद चला गया और वे 14 सैनिक जाजमऊ की गढ़ी में जमे। मेजर फ्लेचर की सेना का इन सैनिकों ने डटकर मुकाबला किया। मेजर फ्लेचर ने कप्तान स्विंटन को गढ़ी पर कब्जा करने के लिए भेजा और वह शुजाउद्दौला का पीछा करते हुए चला गया। स्विंटन ने इन सैनिकों को गढ़ी छोड़कर आने के लिए कहा मगर उन सैनिकों ने कहा कि या तो ससम्मान संधि प्रस्ताव रखें अथवा लड़ेंगे। बाद में वे सारे सैनिक लड़ते हुए मारे गए। तब अंग्रेजों ने तय किया कि अब छावनी कानपुर ही रहेगी। इस तरह से शुरु हुई कानपुर की बसावट।

कानपुर का इतिहास-तीन 
जाजमऊ की गढ़ी गँवाने के बाद शुजाउद्दौला फर्रुखाबाद के बंगश पठान शासकों और बरेली के रुहिल्लों से मदद मांगी पर दोनों ने उसे टका-सा जवाब दे दिया। उलटे बंगश अहमद खाँ ने उसे सलाह दी कि अंग्रेजों से ही माफी मांग ले। उसने फिर वही किया और पैदल ही फ्लेचर से मिलने चला। फ्लेचर को पता चला तो वह भी कुछ कदम पैदल चलकर आया और शुजाउद्दौला से मिला। जाजमऊ से तीन-चार कोस पश्चिम संभवत: नवाबगंज में दोनों मिले और राजा शिताबराय के मार्फत एक संधिनामा पर दस्तखत किए गए। उत्तर भारत में शुजाउद्दौला और अंग्रेजों के बीच हुई यह संधि गुलामी की पहली कड़ी है। तय हुआ कि शुजाउद्दौला अंग्रेजों को 25 लाख रुपये सालाना देगा और बदले में अंग्रेज उसके भूभाग पर दावा नहीं करेंगे पर लखनऊ में रेजीडेंट बैठेगा तथा कोड़ा व इलाहाबाद की जागीरें शाहआलम को लौटानी होंगी। इसी बीच अहमद खाँ ने डेरापुर और अकबरपुर पर कब्जा कर लिया लेकिन उस पर मराठे भारी पड़े और अंत में शुजाउद्दौला ने 1771 में मराठों और बंगश पठानों को मार भगाया। अहमद खाँ की मौत के बाद शुजाउद्दौला ने कन्नौज को अपने राज्य में मिला लिया। तब कोड़ा और इलाहाबाद से बैठकर अल्मास अली इस पूरे इलाके पर शासन करने लगे। लेकिन यहां के क्षत्रिय राजे अल्मास अली की परवाह नहीं करते थे। यहां पर चंदेलवंशी क्षत्रिय शासक कभी-कभार कोड़ा को कर भेजते थे। पुखरायां का शासक दायम खाँ भी लगभग स्वतंत्र ही था। अंत में 1801 में शुजाउद्दौला ने यह पूरा इलाका ईस्ट इंडिया कंपनी को बेच दिया। तब तक अवध का यह इलाका बेहद अशांत और लड़ाकों व गुंडों से भरा था। इसकी वजह थी कि लखनऊ में जिसे भी जिलावतन किया जाता वह गंगा पार कर अवध के इस इलाके में आ जाता।
छावनी तो पहले से ही कानपुर में बिलग्राम से उखड़कर आ गई थी और उस छावनी के लिए बाजार भी आया। आसपास के हजारों परिवार छावनी के इर्द-गिर्द आ बसे थे। ये सब लोग सरसैया घाट के आसपास ही बसे थे और इस इलाके को कैंटूनमेंट होने के कारण कंपू कहा जाता था। साल 1801 में कंपनी ने यह इलाका लिया और अगले साल ही कानपोर के नाम से इसका नामकरण किया तथा 1803 में यहां मिस्टर वेरांड को कलेक्टर बनाया। यहां आकर उसने अपनी कचहरी सरसैया घाट के पास, जहां आज गोरा कब्रिस्तान है, लगाई। वेरांड लिखता है कि कानपोर एक उजाड़ जिला है। जिसमें कानून नाम की कोई चीज नहीं है। दक्षिण में पठान हैं तो पश्चिम में मराठे। कहीं क्षत्रिय राजा हैं तो कहीं ब्राह्मण। शीशामऊ में खटिक हैं तो जाजमऊ में बनिये। जनता त्राहि-त्राहि कर रही है।

कानपुर का इतिहास-चार
कलेक्टर मिस्टर वेराण्ड ने पाया कि कानपुर की सीमा के अंदर आने वाले इलाके में कई दोआब थे। एक तो गंगा और यमुना का दोआब। दूसरा यमुना और सेंगुर का, तीसरा रिंद व सेंगुर का, चौथा पांडु व रिन्द का। इसके अलावा ईशन-गंगा का दोआब तथा पांडु एवं गंगा के दोआबे में शहर बसाने की योजना बनाई गई। कानपुर का ढाल दक्षिण-पूर्व की तरफ था। और आज भी है। गंगा यहां पर कन्नौज के करीब पश्चिम दिशा में प्रवेश करती है और दक्षिण-पूर्व की तरफ फतेहपुर जिले की सीमा में प्रवेश करती है। इसी तरह यमुना कालपी के निकट प्रवेश करती है और भरुआ सुमेरपुर के पास कानपुर की सीमा से फतेहपुर की सीमा में दाखिल हो जाती है। इसके अलावा यहां के कुछ झाबरों से दो और नदियां निकलती हैं वे हैं उत्तरी नोन व दक्षिणी नोन। ये दोनों नदियां बाकी के महीनों में तो सामान्य नाले जैसी प्रतीत होती हैं पर सावन भादों में इतना रौद्र रूप धारण कर लेती हैं कि एक बार तो मैं गजनेर के करीब दक्षिणी नोन नदी में डूब ही गया था। पर इन दोआबों के कारण यहां पर तीनों फसलें होती थीं। गंगा का किनारा यदि तिलहन और गेहूं-जौ आदि के लिए जाना जाता था तो यमुना का किनारा दलहन के कारण। नोन नदी के किनारे-किनारे जायद की फसलें खूब होती थीं और खरबूजा तो कसकर होता था। जबकि रिंद व यमुना के दोआबे में गन्ना। अमरौधा भले यमुना किनारा हो पर पठान लोग अपने साथ आम व अमरूद लेकर आए थे इसलिए यहां की अमराई मशहूर थी। तब यहां पर झील भी कई थीं। एक तो रिंद और सेंगुर के किनारे की गोगूमऊ-रसूलपुर झील पूर साल पानी से लबालब रहती थी और दूर-दूर से पक्षी यहां पानी के लिए आया करते थे। इनमें साइबेरियन क्रेन भी थीं। इसी गोगूमऊ के तिवारियों के यहां मेरा ममाना है। हमारे नाना के पास रिंद नदी के किनारे लगभग एक वर्ग मील का ऐसा जंगल था जिसमें तेंदुये और भेडिय़े भी थे। अंग्रेज हाकिम उनके इस जंगल में शिकार करने आते थे। अब वह जंगल उजाड़ हो चुका है और महुए के आठ-दस पेड़ ही बचे हैं। कानपुर का दुर्भाग्य कि पानी के वे सारे अथाह स्रोत अब सूख गए हैं और अमराई नष्ट हो चुकी है। पहले तो यह पानी और हरियाली नील की खेती करने आए निलहे खा गए। फिर आजादी के बाद ईंट-भठ्ठा उद्योग रही-सही हरियाली चाट गया। जब पानी नहीं रहा न जंगल तब बचा सिर्फ एक रूखा-सूखा कानपुर, जो आज है।
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बाकी का हिस्सा फिर कभी। यहां यह भी बता दूं कि इस साल दिसंबर तक कानपुर के इतिहास पर मेरी यह पुस्तक छपकर आ जाएगी। शायद यह कानपुर के इतिहास की अनूठी पुस्तक होगी जो इसके इतिहास-भूगोल और सामाजिक व राजनीतिक दायरे आदि सब को समेटेगी।)


कानपुर का इतिहास- पांच
मेरे एक चाचा हैं नाम है मुंशी लाल। पेशा है ड्राइवरी। चूंकि दसवीं के बाद वे पढ़ नहीं पाए। अब उनके पास नौकरी का कोई विकल्प था नहीं इसलिए एक रोज वे घर से भाग गए और दो साल बाद जब वे लौटे तब बाकायदा ड्राइवरी की ट्रेनिंग लेकर। हालांकि वे मुझसे कुल चार साल बड़े हैं। पर हैं सगे चाचा इसलिए प्यार से हम उन्हें मुंशी दद्दू कहते हैं। मुंशी दद्दू मस्त हैं, पैसा तो पास में नहीं है पर कभी किसी ने उनको उदास नहीं देखा। न ऊधो का लेना न माधो को देना। आजकल गांव में ही रहते हैं और गांव के कुर्मी जमींदार के यहां स्कूल बस चलाते हैं। हमारे गांव में आबादी ब्राह्मणों की है पर जमींदारी कुर्मियों की है इसलिए वही लोग स्कूल चलाते हैं, महाजनी का काम करते हैं और वही कुर्मी लोग जिसे जो चाहे शिक्षा देते हैं किसी को अंग्रेजी तो किसी को कलमतोड़ शिक्षा। अब मुंशी दद्दू के पास दो-ढाई एकड़ खेत हैं, पुश्तैनी मकान का चौथाई हिस्सा है और बाकी का चौथाई मैने दे दिया है। क्योंकि पिताजी चार भाई थे और मैं अकेला पुत्र हूं इसलिए अपना हिस्सा किसी को देने या बेचने का पूरा अधिकार मेरा ही है। यूं भी गांव में मेरी दिलचस्पी कानपुर के देहाती आंचल की सामाजिक पृष्ठभूमि समझने की ही है इसलिए अब मैं खुद ही चार-पांच साल में एक आध बार ही गांव जाता हूं। जबकि कानपुर जाना महीने में एक बार हो ही जाता है। अब इन दद्दू का उदाहरण कानपुर के इतिहास में देने का मेरा आशय एक क्षेपक जोडऩा है। और थोड़ी निजता व भोगा हुआ यथार्थ लाना भी।
तो हुआ यह कि एक बार कोई चालीस-पैंतालीस साल पहले इन्हीं मुंशी दद्दू के साथ मेरा अपने ममाने यानी गोगूमऊ-रसूलपुर जाना हुआ। सुबह जल्दी हम अपने गांव दुरौली से चले और जब गजनेर पार कर दक्षिणी नोन के किनारे पहुंचे तो होश उड़ गए। नदी का पाट इतना चौड़ा कि उस पार का कुछ दिखे ही नहीं। न यह पता चले कि कहां खेत हैं और कहां नदी की मुख्य धार। ऊपर से बौछार भी जारी थी। हमने किसी तरह एक कोने से धीरे-धीरे डग धरने शुरू किए। करीब एक फर्लांग तक उसी तरह चलते रहने के बाद अचानक मेरा पैर खाई में गया और जब तक संभलता मैं गड़ाप से किसी गड्ढे में समा गया। कपड़ों की पोटली तो हाथ से छूट गई और नीचे जाकर फिर उछाल लगाई तो ऊपर आया मगर इस ऊपर-नीचे में पानी तो पी ही गया। पर अबकी जब ऊपर आया तो मैने सांस ली और खुद को ढीला छोड़ा। कुछ दूर तक बहता रहा। फिर एक ठोकर लगी और एक मेड़-सी पकड़ में आई। मैने उसे जकड़ लिया तब तक दद्दू भी आ गए और किसी तरह उन्होंने खींचा तब बाहर निकल सका। मगर इतना तो हो ही गया कि हम नदी पार कर चुके थे अब जो पानी दिख रहा था वह महज डूबे हुए खेत थे जिनमें पानी कमर से ऊपर नहीं था। पानी पार करने के बाद हम एक एक ऐसे खेत के करीब पहुंचे जिस पर खरबूजों का ढेर लगा था। अब हमारा मन करे कि हम खरबूजे उठा लें। मगर खेत मालिक का डर कि वह आ जाएगा। हम इसी ऊहापोह में वहां खड़े रहे। फिर लालच ने जोर मारा और हमने कुछ खरबूजे उठा ही लिए। ठीक उसी वक्त अचानक एक काला-कलूटा व्यक्ति वहां आ धमका और बोला- बीस आने पसेरी बाजार भाव है। हमने कहा कि ठीक दो लिए हैं तो दो आने ले लो। काफी झिकझिक करने के बाद पता चला कि वह व्यक्ति तो अपना दूर का रिश्तेदार है। फिर उसने पैसे तो नहीं लिए लेकिन एक नीति का सूत्र सुनाया-
सारे की ससुराल न जइयो, खरबूजन की बारी।
भैया ओखे पास न जइयो जेखी चढ़ी उखारी॥
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यानी जीवन में कभी भी साले की ससुराल नहीं जाना चाहिए क्योंकि वहां पर आपकी कद्र नहीं होगी। उसी तरह कभी भी खरबूजों की पराई बार में नहीं जानी चाहिए तथा उस व्यक्ति से आमद-रफ्त नहीं रखनी चाहिए जिसके यहां कोल्हू पर गन्ना पेरा जा रहा हो।)
आप कह सकते हैं कि कानपुर का इतिहास बताते-बताते मैं कहां दून की हांकने लगा। लेकिन यह लिखने का मेरा उद्देश्य यह बताना था कि कानपुर में आज हम पानी की घोर कमी देख रहे हैं किन्तु ज्यादा दिनों पहले तक न तो कानपुर में पानी की कमी थी न जायद की फसलें लेने की किसान की ललक की। मगर बाद में कैश क्रॉप्स ने किसान को ऐसा बरबाद कर दिया कि कम जोत वाले किसान हर साल आत्महत्या कर लेते हैं। क्योंकि चार बीघे खेती और सब में सरसों बो दी। अतिवृष्टि या कम वृष्टि ने पता लगा सब चौपट कर दिया और पैसों के लालच में किसान की भूखों मरने की नौबत आ जाती थी। कानपुर में अब खरबूजा शायद ही कोई बोता हो और गन्ने की फसल तो अब होती ही नहीं। तथा दक्षिणी और उत्तरी नोन नदियों का उदगम व बहाव क्षेत्र अब सब कब्जिया लिए गए हैं।
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इतिहास लेखन की दिक्कतें!
कितना मुश्किल होता है आधुनिक इतिहास पर काम करना। पुराणेतिहास पर तो आप लफ्फाजी कर सकते हैं लेकिन आधुनिक इतिहास पर तो सब कुछ सामने है। कानपुर का इतिहास लिखने की योजना आज से 15 वर्ष पूर्व तब बनाई थी जब मैं कानपुर में अमर उजाला का संपादक था। मगर तब अखबार के काम से ही फुर्सत नहीं मिलती थी कि इतिहास पर कुछ नया काम कर सकूं। कुछ सामग्री अवश्य इकट्ठी कर ली थी। पर अब जब उसे कार्यरूप देना शुरू किया तो पता चला कि मेरी सामग्री तो पासंग बराबर भी नहीं है। कानपुर के पास कोई अतीत हालांकि नहीं है पर उन्नीसवीं सदी में कानपुर के अंदर इतनी उथल-पुथल हुई कि इसे अगर हिंदी हार्टलैंड का रेनेसाँ बताया जाए तो गलत नहीं। यहां बहुत कुछ बदला। व्यापार, उद्योग और राजनीति भी लेकिन कहीं कोई रिकार्ड नहीं। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद से अंग्रेजों को कानपुर से चिढ़ हो गई और जिस तेजी से कानपुर का विकास उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्ध में हुआ उसी तेजी से 1857 के बाद कानपुर को उन्होंने स्वयं गंगा में डुबोया। कानपुर का इतिहास नहीं लिखा गया। जो कुछ रिपोर्ट लिखी गईं वे पत्रकारीय नजरिये से हल्की-फुल्की। गजेटियर में इस शहर को दबा दिया गया। मगर फिर भी कानपुर 1947 तक इतना बड़ा तो था ही कि दिल्ली उसके आगे फीकी थी। लेकिन आजादी के बाद कानपुर में राजनीतिकों का बौनापन इस कदर रहा कि वे कानपुर को बचाए नहीं रख सके। कानपुर की सारी कमाई लखनऊ-दिल्ली को जाती रही। मजा तो यह कि आज लखनऊ की जो भी चमक-दमक है वह सब कानपुर के बूते मगर कानपुर को इस कदर लूट लिया गया कि यहां पर न तो उद्योग बचे न कल-कारखाने न व्यापार न ट्रेड यूनियन्स न मजदूर न रोजगार न सड़कें न परिवहन के सुगम साधन। यहां बचा तो कानपुर के गले में कैंसर की तरह लपटा गुटखा। जिसके कहीं कोई कारखाने नहीं गोदाम नहीं और नंबर एक में पैसा नहीं। मिलों को बंद कर दिया गया और मजदूरों को भगा दिया गया पर मिल मालिक मिल कैंपस बेचकर और धनी होते गए। आज भी कानपुर के लालाओं के पास पैसा तो अथाह है लेकिन पैसे का ज्ञात स्रोत नहीं। उप्र में टीबी के जनक इस शहर का औद्योगिक इतिहास लिखने की जब मैने ठानी तो पता चला कि वे लोग तो बचे ही नहीं जो कुछ बता सकते थे और कानपुर के पास किताबों का घोर अभाव है। अलबत्ता सुना है कि कानपुरियम के पास कुछ साहित्य है मगर मेरे पास उनका कोई संपर्क नहीं। माकपा नेता सुभाषिनी अली ने जो येलाण्ड की किताब जरूर सुझाई है लेकिन अमेजन में वह मिल नहीं रही। अब सहारा सिर्फ साहित्यकार प्रियंवद और बुजुर्ग पत्रकार श्री विष्णु त्रिपाठी ही बचे हैं। काश पहले कोशिश की होती तो कामरेड राम आसरे, कामरेड दौलत राम जिंदा थे। विनय भाई थे। नरेश चंद्र चतुर्वेदी थे। केजी तिवारी जीवित थे। कानपुर का अधिकृत इतिहास लिखने वाले नारायण दास अरोड़ा के पोते स्वर्गीय अनिल सारी जीवित थे। पर अब जब सोचा तो पाया कानपुर में अब कोई बुजुर्ग बचा ही नहीं। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि मैं लिखूंगा नहीं। कानपुर का आधुनिक इतिहास तो मैं लिखूंगा ही। हां अगर किसी के पास कोई स्रोत हो तो कृपा कर बताए।
ज्यों-ज्यों बूड़े श्याम रंग, त्यों-त्यों उज्ज्वल होय!
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कानपुर का इतिहास है मजेदार!)
श्याम रंग की विशेषता यह है कि यह जितना ही गहराएगा उतना ही चमकदार होता जाएगा और निखर कर सामने आएगा। यही हाल इतिहास का है जितना डूबो उतना ही नया। अब जब मैने कानपुर के इतिहास की गहराई में जाना शुरू किया तो एचआर नेविल की किताब से तमाम ऐसी जानकारियां मिलीं जो हिंदुस्तानी सामाजिक जीवन के के नए-नए रहस्य उजागर चलती हैं। तब पता चलता है कि इतिहास हमारे सामाजिक जीवन के लिए भी अपरिहार्य क्यों है। नेविल लिखते हैं कि 1891 में हिंदू और मुसलमानों में जाति व्यवस्था लगभग बराबर की थी। दोनों में साठ से ऊपर जातियां थीं और कोई जाति किसी की दबैल नहीं थी। हिंदुओं में ब्राह्मणों की संख्या अन्य जातियों की तुलना में अधिक थी। कानपुर जिले में ब्राह्मण करीब 15.4 प्रतिशत थे यानी तब की मर्दनशुमारी के हिसाब से 171569 लोग ऐसे थे जो स्वयं को ब्राह्मण बताते थे। कानपुर और शिवराजपुर तहसील में तो उनकी तूती बोलती थी। ज्यादातर धनी-मानी और बनियों की तरह लेनदेन का धंधा भी करते थे। ब्राह्मणों द्वारा महाजनी नई बात नहीं है। बड़े चौराहे के पास जिन महाराज प्रयागनारायण तिवारी का शिवाला है वे महाजनी करते थे और कलकत्ता से अपना बैंक लेकर कानपुर आए थे। चौक सर्राफे में आज भी ब्राह्मण महाजन व स्वर्णाभूषण बेचने वाले सबसे ज्यादा मिलेंगे। उसके बाद खत्री फिर बनिया। कानपुर में मारवाड़ी न आते तो बनिया यहां अत्यंत दीन अवस्था में थे। ब्राह्मणों में यहां असंख्य जातियां थीं। पहले नंबर पर कनौजिये फिर गौड़ों के गांव और इसके बाद सनाढ्य और तब सारस्वत एवं सरयूपारीण। इनके अलावा चौधरी ब्राह्मणों की आबादी भी खूब थी। औरय्या में दुबे चौधरी, तिर्वा में तिवारी चौधरी और बरौर के चौबे चौधरी कनौजियों में बड़े प्रख्यात हुए। ये सब बड़े जागीरदार थे और सिंह की उपाधि लगाते थे। इन ब्राह्मणों का जातीय बटवारा अकबर के समय किया गया था। अकबर के समय ही चौधरियों को सिंह टाइटिल लगाने की अनुमति दी गई थी। इसके अलावा रिंद के किनारे-किनारे जगरवंशी आबाद हैं। कहा जाता है कि कोड़ा जहानाबाद के मुस्लिम शासक के यहां जगनप्रसाद बड़े जागीरदार हुए। इसलिए शाहजहां ने इन्हें सिंह उपाधि दी। इन जगरवंशियों में कांग्रेस के एक बड़े नेता चौधरी बेनीसिंह अवस्थी हुए हैं। ये जगरवंशी खूब धनाढ्य हुआ करते थे पर समय के फेर में सब बरबाद हो गए। इन जगरवंशियों के यहां घूंघट प्रथा नहीं थी। हमारे कानपुर के घर में एक जगरवंशी चौधरी दिलीप सिंह अवस्थी किरायेदार थे और मैने कभी उनकी पत्नी को घूंघट करते नहीं देखा।
इसके बाद थे चमार। इनकी आबादी कोई 13.5 प्रतिशत थी और ये अधिकतर ब्राह्मणों और राजपूतों के यहां खेत मजदूरी करते थे। पर जब एलेन कूपर कंपनी ने यहां मिलें स्थापित कीं तो लाल इमली में सबसे पहले काम करने चमार ही आए। ये बाद में इतने संपन्न हो गए कि कई लोगों ने तो जमींदारी भी खरीदीं और इनमें चौधरी साँवलदास भगत मशहूर हुए हैं। कुछ चमारों ने लेनदेन का काम भी शुरू किया। स्वामी अछूतानंद ने इनके लिए बड़ा काम किया। तीसरे नंबर पर थे अहीर और इनकी आबादी कोई 10.73 थी। मनुष्य गणना के लिहाज से 122380 अहीर। किसानी और पशुपालन दोनों काम ये करते थे। इनकी जातीय विशेषताओं पर फिर कभी लिखूंगा। खैर अहीरों के बाद आबादी ठाकुरों की थी और उसमें भी नंबर एक पर थे गौर। जो शायद मेवों के समय यहां आए। कानपुर में कुल राजपूत आबादी 8.01 प्रतिशत थी। ये लोग अपना मूल स्थान राजस्थान नहीं बल्कि मालवा बताते हैं। इसके बाद नंबर गौतमों का था और फिर चौहानों का, परिहारों व कछवाहों तथा सेंगरों का। इनके अलावा मुस्लिम राजपूत भी खासी संख्या में थे। इनके बाद नंबर आता है कुर्मियों का जिनकी कानपुर में आबादी 4.76 परसेंट थी। और अधिकतर घाटमपुर व भोगनीपुर में आबाद थे। घाटमपुर में इनकी एक गढ़ी बीरपाल में थी जहां इनकी टाइटिल चौधरी थी। कुर्मियों की एक बड़ी आबादी झमैयों (झबैयों) की थी और कहा जाता है कि ये किसी शेख झामा के शिष्य थे। शेख मखदूम जहानिया जहानगश्त के असर में थे और इनके यहां हाल तक आधी रस्में मुसलमानी थीं। इनके बाद लोध थे और फिर काछी, कोरी, माली, धोबी आदि जातियां। तेलियों की आबादी भी पर्याप्त थी। करीब तीन प्रतिशत बनिये थे और इतने ही कायस्थ।
मुसलमानों में 56 जातियां थीं पर ज्यादातर सुन्नी करीब 97 प्रतिशत और तीन प्रतिशत शिया थे। मुस्लिम जातियों में शेख सबसे ज्यादा थे करीब 47.7 प्रतिशत। इनके अंदर सिद्दकी सबसे ज्यादा फिर कुरेशी। दूसरे नंबर पर पठान थे करीब 17 प्रतिशत। इनके बाद नंबर सैयदों का आता है जिनकी आबादी तब 7056 थी। इसके बाद अन्य जातियां। उस समय कानपुर में 2633 ईसाई थे। जिनमें 345 योरोपियन और बाकी के देसी।
नोट- यह सारी सामाजिक संरचना एचआर नेविल, आईसीएस की पुस्तक से ली गई है। इसलिए अगर इन आंकड़ों में कुछ भी अविश्वसनीय लगे तो कृपया मेरे खिलाफ मोर्चा मत खोल लेना। सीधे ऊपर का टिकट लीजिए और जाकर नेविल से भिड़ जाइएगा। अपनी बात को पुख्ता करने के लिए मैं नेविल की पुस्तक के कुछ अंश डाले दे रहा हूं।
कानपुर का इतिहास- सात
ब्लेयर कीन ने लिखा है कि 1827 में कानपुर जिले में कुल बीस लाख मवेशी थे। इनमें से सात लाख गोधन, इतने ही बकरे-बकरियां और तीन लाख भैंस धन व एक लाख गधा, खच्चर व घोड़े थे।उस समय जागीरदार और राजा लोग बैलगाड़ी को रथ के तौर पर इस्तेमाल करते थे। सिर्फ बाजीराव पेशवा द्वितीय के पास ही घोड़ों से जुड़े रथ थे। बैलगाड़ी का रथ ज्यादा आकर्षक होता था। उसमें जुते बैलों को दुशाला ओढ़ाया जाता था। रास्ते में बैल हाजत न कर दें इसका ख्याल रखा जाता था। और एक आदमी रथ के पीछे दौड़ता था कि अगर उसे लगे कि बैल हाजत करने वाले हैं तो वह तत्काल अपने हथेली से उसे लोक लेता था। घोड़ा गाड़ी या तो अंग्रेज प्रयोग में लाते थे अथवा जब भी लखनऊ का नवाब कानपुर आता तो वह प्रयोग करता था। कुछ रथ और हाथी बाजीराव के महल में थे। नवाब गाजीउद्दीन हैदर जब भी कानपुर आते तो घोड़ागाड़ी से ही आते पर कानपुर में घूमने के लिए वह हाथी की सवारी ही करते। इसके लिए उनका फीलखाना था। यह वहीं पर है जहां आज कमला टावर है। नवाब ने गाय काटने पर प्रतिबंध लगा रखा था मगर योरोपीय सिपाही और अफसर तथा कुछ ईसाई गाय का मांस खाते थे इसलिए वे छावनी में काटी जातीं। बाकी के हिंदू व मुसलमान बकरा ही खाते थे। पक्षियों में तीतर, बटेर व मोर का मांस चाव से खाया जाता था। तब मुर्गा खाना पसंद नहीं किया जाता था। दूध बेचा नहीं जाता था। कुछ मुस्लिम घोसी जरूर नियमित अंग्रेज छावनी में दूध की सप्लाई करते थे। हिंदू अहीर दूध बेचना पाप समझते थे। कुछ स्थानीय बनिये और अहीर शहर में आकर दूध से बना खोया व उसमें गुड़ मिलाकर पेड़ा बनाते थे। मगर मुस्लिम हलवाई खूब आबाद थे और जलेबी, समोसा तथा हलवा बेचते थे। उस समय कानपुर में छुट्टन मियाँ बरेली वालों का हलवा बड़ा मशहूर था। विलायत से बनी चीजें बिसाती बेचते थे और अधिकतर लाहौर से आए मुसलमान और हिंदू यह काम करते थे। ये लोग खत्री कहलाते थे। लाला ईश्वरचंद ईसामल एक बड़ा नाम था। इसी तरह हाजी सईद मुहम्मद छाते वाले भी।
हिंदुओं ने दूध बेचने का काम 1867 से शुरू किया और तब एक रुपये में आठ सेर दूध का भाव था। मगर तब भी दही या मठ्ठा का दाम नहीं लिया जाता था। मेरे बचपन तक में मठ्ठा मुफ्त में मिलता था और हलवाई खुरचन नहीं बेचा करते थे। यह सब फ्री में मिलता था। मेरे अपने गांव में जमींदारों के यहां कई भैंसें थीं और पूरा गांव उनके यहां से मठ्ठा फ्री में लेता था। किसी के घर शादी-विवाह या जनेऊ हो तो सारे अहीर उस घर में उस दिन अपने गोधन का सारा दूध उसके यहां भेजते थे और उसके बदले में कोई पैसा नहीं लिया जाता था। हर किसान अपने घर में एक गाय तो रखता ही था। भैंस रखना तब लग्जरी थी। अलबत्ता बकरियां खूब होती थीं और उनका दूध पिया जाता था। जमींदार अपनी रियाया से मुफ्त में काम करवाते थे जिसे बेगार कहा जाता था। कहा जाता है कि बेगार की परंपरा अंग्रेजों ने शुरू करवाई क्योंकि लगान नकद लेने के कारण किसान बर्बाद हो गए। वजह यह थी कि उनका जिंस सस्ता था और लगान पैसों देना बहुत भारी पडऩे लगा। इसलिए किसान गांव छोड़कर भागने लगे। छोटी जोतों वाले किसान सबसे पहले शहर चले गए और वहां जाकर मजदूरी करने लगे या अंग्रेजों के यहां नौकर हो गए।
कनपुरिये भी अजीब आज से नहीं बल्कि वर्षों से होते आए हैं। सर जनरल व्हीलर की याद में छावनी के करीब एक मोहल्ला बसाया गया और नाम रखा गया व्हीलर गंज। अब कनपुरियों ने जब कैंटोनमेंट का उच्चारण कम्पू कर दिया तो भला वे व्हीलर को क्यों न बदलते। हुआ यह कि 1857 में सूबेदार हुलास सिंह ने जनरल व्हीलर को खूब छकाया और यही बात कनपुरिया मिजाज को भा गई और उस व्हीलर का नाम रख दिया हूला गंज। आज वह हूलागंज रेलवे स्टेशन के करीब है। और वहां के भड़भूजे व सत्तू मशहूर है। इसी तरह कानपुर के एक कलेक्टर एचडी मोल ने मेस्टन रोड के करीब बसाया मोलगंज लेकिन कनपुरिये उसे आज तक मूलगंज ही बुलाते रहे। मूलगंज कानपुर का वह मोहल्ला है जिसका नाम लेने में शर्म महसूस होती है और अक्सर रिक्शेवाले से कहा जाता है कि मेस्टन रोड चलोगे? टैंपो वाले भी उसका नाम नहीं लेते। मगर मशहूर वह बहुत है। हूलागंज के करीब एक मोहल्ला है फेथफुल गंज। यहां के लोग 1857 में अंग्रेजों के वफादार रहे इसलिए इस मोहल्ले का नाम फेथफुलगंज पड़ गया।
ईस्ट इंडिया कंपनी के गुमाश्ताओं की खूब कमाई थी क्योंकि वह अंग्रेजों और देसी लोगों के बीच दलाली किया करते थे। ऐसे ही एक दलाल थे मुंशी रामनारायण खत्री जिनकी याद में आज रामनारायण बाजार आबाद है। यह मोहल्ला आज भी है। जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने कानपुर बसाने का काम शुरू किया तब कानपुर में नागा साधु जिन्हें गिरि या गोसाईं कहा जाता था बहुत ताकतवर थे और पूरा सिकंदरा परगना उन्हीं का था। गोसाईं हिम्मत बहादुर के पुत्र गोसाईं नरेंद्र गिरि की जायदाद रसधान में थी। उसकी रानी ने कानपुर में एक तालाब बनवाया था जिसे तब रानी की गड़ैया कहा जाता था। इसी को पाट कर कलेक्टरगंज की सब्जी मंडी बनाई गई। इसी तरह बेगम गंज का पुराना नाम बेकनगंज था जिसे कानपुर के जिला जज बेकन साहब ने बसाया था। अनवरगंज को अनवर खाँ ने बसाया था और हीरामन का पुरवा हीरामन चमार ने। जुही की वाराह देवी खटिकों की देवी थी और यहां पर सुअरों की बलि दी जाती थी। वहां के खटिक भी जब शहर आकर बसे तो कलेक्टर गंज के पास खटिकाना बसा
जब भी मैं कानपुर जाता हूं बिठूर अवश्य जाता हूं। वहां गंगा नहाने की हिम्मत तो नहीं करता लेकिन फिर भी मुझे बिठूर तीर्थ जैसा लगता है। यहीं नाना धधूपंत पेशवा और अजीमुल्ला खाँ ने 1857 के विद्रोह की नींव रखी थी। यहीं पर झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अपना बचपन गुजारा था। अगर बिठूर में बाजीराव पेशवा निर्वासित होने के बाद न आकर बसते तो शायद बिठूर का इतिहास वह नहीं होता जो आज है। यह तो एक छोटी सी सिखों की रियासत थी जिन्हें अंग्रेजों का सुरक्षा कवच था। परमट घाट पर बैठा अंग्रेज हाकिम उन्हें बुलाकर अक्सर बिठूर के बारे में पता कर लेता था। फरुखशियर के समय कोड़ा जहानाबाद का सूबा बादशाह ने अपने एक वफादार सेवक अल्मास अली को दे दिया था जो एक हिजड़ा था। बाद में उसने शासन में मदद करने हेतु अपने भानजे भागमल जाट को फाजिल्का से बुला लिया था। उसी राजा भागमल के वंशज बिठूर व रमेल की जमींदारी को भोग रहे थे और उन्हीं की रियासत के 120 गांवों को काटकर अंग्रेजों ने पेशवा बाजीराव द्वितीय को दे दिए थे साथ में 75 लाख रुपये सालाना की पेंशन भी। इसी आय में से बाजीराव पेशवा अपने 75000 आश्रितों के लिए भोजन पानी का इंतजाम करते थे।
बिठूर जाकर जयंती दादा उर्फ जयंती शुक्ला की नाव में बैठकर गंगा दर्शन का अलग आनंद है। ध्यान रहे कि बिठूर में मल्लाही का काम ब्राह्मण करते हैं। यहां पर नाव चलाने वाले केवट जाति के नहीं बल्कि तिवारी, मिश्रा, पांडेय और शुक्ला हैं। मैं जब भी वहां जाता हूं तब जयंती दादा को बुलवाता हूं और उन्हीं की नाव पर सफर करता हूं। नाव भी एकदम बजरा सरीखी। ऊपर तिरपाल नीचे गाव तकिये व गद्दे। जयंती दादा की नाव में बैठने का एक आनंद और है कि वे सिर्फ नाविक ही नहीं हैं बल्कि गाइड भी हैं। चलते-फिरते एन्साइक्लोपीडिया। कई बार लगा कि 1857 के पौने दो सौ साल पूरे होने पर अगर फिर किसी विलियम डेलरिम्पल को बुलाना पड़ा तो मैं मोदी सरकार को आग्रह करूंगा कि एक बार जयंती शुक्ला का आत्मपरिचय भी एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका में शामिल कराया जाए। जयंती दादा पूरा बिठूर का इतिहास आपको बता डालेंगे। अगर साथ में बिठूर के ध्रुवटीला मंदिर के महंत मधुकर मोघे हों तो क्या बात है। मधुकर मोघे का भी अपना विचित्र इतिहास है। युवावस्था में बंबई से ग्रेजुएशन कर यहां आ गए। तब ध्रुव टीला एक जंगल था जिसमें जंगली जानवर से लेकर सांप बिच्छू विचरण किया करते थे। यहां उनके मामा का परिवार मराठों के समय से पुजारी था। मामा ने उन्हें रख लिया और करीब सवा सौ साल की उम्र पार कर जब वे दिवंगत हुए तो ध्रुवटीला की सर्वराकारी मधुकर मोघे को दे गए। तब से वे और उनका विशाल परिवार यहीं है। उन्होंने इस जंगल में मंगल कर दिया है। मधुकर मोघे और जयंती दादा तो रानी के बचपन की कहानियां ऐसे सुनाते हैं जैसे सब कुछ उनकी आंखों के सामने घटा हो। हां रानी और नाना धूधूपंत पेशवा का अंत बताते हुए वे रोने लगते हैं। कहते हैं कि हार के साथ ही नाना अपने परिवार के साथ गंगा पार कर गए थे। पर उनकी एक बेटी मैना यहीं छूट गई। अंग्रेजों को जब किला सूना मिला तो किले को तोपों से उड़ा दिया और पांच साल की मैना को जिंदा ही फूंक डाला। उस किले के आसपास की जमीन पर अब माफियाओं का कब्जा है और बिठूर को कुछ धार्मिक माफियाओं ने अपने चंगुल में ले लिया है। यहां अब सुधांशु महाराज से लेकर आशाराम बापू तक के आश्रम हैं और गंगा तट की यह भूमि अपनी सारी पवित्रता भूल चुकी है। यहां पर कानपुर शहर के धनपतियों के फार्महाउसेज हैं जहां रात दिन सुरा साकी की महफिलें चलती हैं। कानपुर के मारवाड़ी बनिये, पंजाबी और सिंधी धनपशुओं तथा कनौजिये पंडितों को यहां नाव में बैठकर मद्यपान करते मैने स्वयं देखा है। उनके लिए पुण्यसलिला गंगा एक ऐसी प्रवाहमान नदी है जिसके जल के ऊपर नौकायन किया जा सकता है और जरूरत पडऩे पर उसके जल को सुरा में मिलाकर पिया जा सकता है अथवा चाँदनी रात में जलक्रीड़ाएं की जा सकती हैं। वैसे पौराणिक आख्यानों में यहीं से सृष्टि की शुरुआत बताते हैं। कहते हैं कि ब्रह्मा जी ने यहीं से सृष्टि की शुरुआत की थी।
कानपुर का इतिहास-12
झाड़े रहो कलेक्टर गंज!
एक तो पहले यह तय हो जाए कि कलेक्टर गंज नाम कैसे पड़ा। दरअसल जिले के पहले कलेक्टर वेलाण्ड ने कलेक्टर गंज बसाया सो इस पूरे इलाके का नाम कलेक्टर गंज पड़ गया और रानी (वही जुही की रानी कुंअर) का तालाब सुखाकर जो जमीन तैयार हुई वहां पर गल्ला मंडी लगने लगी इसलिए इसे कलेक्टर गंज मंडी कहा जाने लगा। मंडी तब एक नया कॉन्सेप्ट था। क्योंकि इसमें अंग्रेजों ने एक दलाल पूंजीपति वर्ग तैयार किया जिसे आढ़ती या अढ़तिया कहते हैं। अढ़तिया को कुछ नहीं करना होता था बस वह जमीन मुहैया कराता था ताकि खरीदार और बेचने वाला एक स्थान पर आ सके। इसके पहले फसल बेचकर नगदी कम ही कमाई जाती थी। आनाज बेचने का काम राज्य के जिम्मे था। अंग्रेजों के पहले राजा अधिकतर अपना कर फसल के पांचवें भाग के रूप में लेता और वही फसल बेचता। मगर फौजी रसद की सप्लाई के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने पहली बार अढ़तिया के रूप में एक नया दलाल वर्ग तैयार किया। इस मंडी में अनाज बहुत सस्ता बिकता और अढ़तिया ऐसे छन्ना लगाता जिससे बहुत सारा आनाज जमीन में गिरता रहता। तब कई धनीमानी लोग जो निलहों के अत्याचारों से बर्बाद हो चुके थे अपनी मर्यादा की रक्षा के लिए रात को यही जमीन पर बिखरा आनाज बटोर लाते। इसी आनाज से उनका पेट भरता। मगर दिन को वही लोग बाँकें बने घूमते। वाजिद अली शाह जैसा घाघरेदार कुरता और चौड़ी मोहरी वाला पाजामा, होठ पान से लाल। किसी दिन रग्घू चौरसिया ने देख लिया कि अरे रात को तो लाला बाँकेमल अग्गरवाले सीला बिन रहे हैं। तब सबेरे जब वे लाला जी पान खाने आए तो पान वाले ने आदाब करते हुए कहा कि हुजूर थोड़ा रुकिए बनाते हैं। एक ग्राहक निपटा दो निपटा और जब तीसरा भी निपट गया तो लाला जी का धैर्य चुक गया। उसे हड़काते हुए बोले- अबे रग्घू पान बनाता है या लगाऊँ दो चार। रग्घू बोला- हुजूर झाड़े रहो कलेक्टर गंज। अब लाला जी को तो सांप सूंघ गया। अब जो सुने वही कहे झाड़े रहो कलेक्टर गंज। तब से यह मुहावरा चल निकला।
कानपुर का इतिहास-15
नीला कानपुर और पीला कानपुर!
शंभूनाथ शुक्ल
अंग्रेज जब कानपुर आए तो नील की खेती यहां भी कराने की सोची। कानपुर बहुत मुफीद था। यहां पानी की कमी नहीं और दोआबे खूब थे। गंगा-यमुना के दोआबे के बीच ही ईशन-गंगा, उत्तरी नोन-गंगा व पांडु-गंगा के अलावा यमुना के साथ सेंगुर, दक्षिणी नोन व रिंद का दोआबा था। साथ ही कई झीलें भी थीं और मानसून की बारिश असाढ़ से ही शुरू हो जाया करती थी जो पूरा भादों तक भिगोती थी। अगर यमुना और सेंगुर के किनारों को छोड़ दिया जाए तो पानी की कमी तो नहीं थी। ऐसे में लखनऊ का एक जनरल मार्टिन 1820 में कानपुर आया और उसने नजफगढ़ में एक फैक्ट्री लगाई। नवाबजादा नजफ खान की बहनों की यह जमीन थी। जल्दी ही उसने 25 और फैक्ट्रियां खड़ी कीं और जमीन लेकर नील के बीज उगाने लगा। उस समय जमीन खूब सस्ती मिल जाया करती थी क्योंकि कंपनी की बंदोबस्त प्रणाली के तहत किसानों को लगान नकद देनी पड़ती थी। नील की खेती के वास्ते अंग्रेज कंपनी नकद पैसा देती थी। मार्टिन का यह व्यवसाय खूब फला-फूला मगर उसकी मृत्यु के बाद उसके भतीजे ने चाचा की ये फैक्ट्रियां मेसर्स फोर्टियर एंड डिबोइस को बेच दीं।
इनकी देखादेखी मेसर्स एडम मैक्सवेल ने महाराज पुर में अपनी फैक्ट्रियां लगाईं और 300 एकड़ में नील की खेती शुरू करवाई। महाराजपुर के एक हिंदुस्तानी जिमिंदार खगोल सिंह ने भी नील की खेती शुरू की और कुछ फैक्ट्रियां भी लगाईं। घाटमपुर, और भोगनीपुर के तमाम गांवों में निलहे गोरों ने फैक्ट्रियां लगाईं और अपनी कोठियां भी खड़ी कीं। स्वयं अपने गांव, दुरौली जो तब भोगनीपुर तहसील में था निलहों की ये कोठियां मैने बचपन में देखी थीं। मगर नील का यह धंधा कानपुर में चल नहीं पा रहा था। इसकी वजह थी एक तो लोकल मार्केट था नहीं और इसके लिए नगदी बहुत चाहिए थी। दूसरे किसानों ने गरीबी के बावजूद अपनी जमीनों पर नील की खेती करने से मना कर दिया। 1830 में कुल जिले में मात्र 14598 एकड़ में ही नील की खेती होती थी। जबकि बिहार में नील की खेती खूब होती थी और फैक्ट्रियां भी बहुत थी इसलिए यहां से सिर्फ बीज सप्लाई का काम होता था। 1865 में 24088 एकड़ पर नील की खेती हुआ करती थी। एक बार फिर से नील की खेती का रकबा बढ़ाने का फैसला किया गया और इसके लिए शिवराजपुर जैसे सर्वाधिक उपजाऊ इलाके को चुना गया। पुरानी फैक्ट्रियां फिर से खोली गईं। 1876 से 1885 के बीच औसत तौर पर 44489 एकड़ पर नील की खेती होने लगी। लेकिन फिर एक बार गिरावट का दौर शुरू हुआ और 1906-7 के बीच यह रकबा मात्र छह हजार एकड़ का रह गया जो कुल कृषि भूमि का एक प्रतिशत भी नहीं था। धीरे-धीरे नील का कारोबार कानपुर में ठप पड़ गया।
इसलिए अंग्रेजों ने नील का कारोबार कानपुर से उठा लिया। खाद्यान्न उगाने की जड़ता और प्रेम के कारण नकदी फसलों का कारोबार चल नहीं पाया। मगर कानपुर में नकदी फसलों के चक्कर में अंग्रेजों ने गन्ना और सरसों बोने का विकल्प रखा मगर कानपुर के किसान ये दोनों फसलें जब जरूरत भर की उगाते थे। लेकिन कालांतर में सरसों का रकबा बढऩे लगा और किसान तेल मिलों के लिए भी सरसों बोने लगे क्योंकि कलकत्ता में बैठे कंपनी के हुक्मरानों को मछली बहुत पसंद थी और उसके लिए सरसों का तेल अपरिहार्य था। यह सरसों का तेल कानपुर की मिलों से ही जाता था। कानपुर में तमाम तेलियों ने अपने कोल्हू लगाए। कंपनी ने कानपुर में कृषि को फायदे का सौदा बनाने के लिए एक प्रयोगशाला बनाने की सोची और 1881 में गुटैया तथा नवाबगंज के बीच एक कृषि प्रयोगशाला स्थापित की गई। बाद में यहां पर कृषि विज्ञान और कृषि के जरिये उगाहे जाने का प्रशिक्षण देने के लिए सरकार ने एक कृषि प्रशिक्षण केंद्र खोलने का फैसला किया गया और कानूनगो का प्रशिक्षण यहां दिया जाने लगा। पहले साल यानी 1893 में यहां पर 25 कानूनगो छात्र पढऩे आए। इसके बाद इसे कालेज बनाने का कृषि कालेज बनाने का फैसला किया गया और कृषि विज्ञान की पूरी पढ़ाई के लिए दो साल का कोर्स रखा गया। यही आज चंद्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय है।
कानपुर का इतिहास-16 
दिल्ली की कमाई चपरघटा में गँवाई!
शंभूनाथ शुक्ल
वह 1345 का साल था और दिल्ली में मुहम्मद बिन तुगलक का राज था। उसी साल दोआबे में भयानक सूखा पड़ा। गंगा-यमुना का यह पूरा इलाका वीरान हो गया और गांव खाली हो गए। लोग कहीं और जाकर बस गए। कुछ लोग पूरब निकल गए तो कुछ पछाँह और दक्षिण। कालांतर में यह पूरा क्षेत्र जंगल में बदल गया और यमुना के किनारे के पूरे इलाके में जंगल और जंगली जानवर ही फैल गए। 1421, 1471 में भी यहां सूखा पड़ा। इसके बाद 1631 का सूखा तो इतना जबर्दस्त पड़ा कि पूरा एशिया ही तबाह कर उठा। हालांकि दक्षिण भारत फिर भी हरा-भरा रहा और यहां के ज्यादातर लोग यहां से पलायन कर गए। इस सूखे का असर यह पड़ा कि कानपुर दुर्भिक्ष के चलते त्राहि-त्राहि कर उठा। यमुना के किनारे-किनारे आगरा से कोड़ा तक का पूरा इलाका वीरान हो गया। कुछ ही वर्ष बीते तो गंगा के पूर्वी इलाके में सूखा पड़ गया। भयानक स्थिति थी लेकिन तब के बादशाह औरंगजेब ने दिल्ली से कुमुक भेजी ताकि भूखों को खाना दिया जा सके। पर यह कुमुक गंतव्य तक जाती इसके पहले ही कानपुर में मुगल रोड पर यह लूट ली जाती। खासकर भोगनीपुर और मूसानगर के बीच चपरघटा में। यहां पर सेंगुर का पुल नीचा था और उसके किनारे बहुत ऊपर । सड़क पर आ रहे लोगों का नीचे कुछ पता ही नहीं चलता और जैसे ही लश्कर सेंगुर के पुल पर आता लूटपाट हो जाती। मुगल बादशाह ने सिपाही भेजे पर लुटेरों को दबोचने में वे नाकाम रहे। तब चपरघटा के बारे में तो कहावत ही चल निकली- दिल्ली की कमाई चपरघटा में गँवाई!
कंपनी सरकार के समय सबसे बड़ा सूखा 1783-84 में पड़ा और यह इतना भयानक था एवं कंपनी सरकार इतनी लापरवाह रही कि किंवदंतियों में चालीसा का सूखा मशहूर हो गया। चालीसा के सूखे के अवशेष अर्थात बंजर हो चुकी जमीन मैने अपने बचपन में मूसानगर के आसपास पाए थे। चालीसा का सूखा इसे इसलिए कहा गया कि यह सूखा संवत 1840 में पड़ा था। सन और संवत के बीच 57 साल का अंतर है। आज भी ईस्वी सन 2017 चल रहा है पर विक्रमी संवत 2074 है। मानसून पूरी तरह धोखा दे गया और बुंदेलखंड के साथ-साथ कानपुर का दक्षिणी इलाका इसकी चपेट मेें आ गया था। कंपनी सरकार सूखे से निपटने के कोई ठोस कदम नहीं उठा सकी। दरअसल उस वक्त कंपनी के दो पदाधिकारियों ने सूखे के बारे में अलग-अलग रिपोर्ट दी। जहां कर्नल बायर्ड स्मिथ ने इसे सदी का भयावह सूखा बताया वहीं कंपनी की तरफ से बंदोबस्त करने आए मिस्टर रोज ने इसके बारे में टिप्पणी की कि बारिश कम होने से फसल कमजोर रही। अब स्मिथ की बात ही सही लगती है क्योंकि उस साल गेहूँ रुपये का आठ सेर बिका जबकि तब गेहूँ रुपये का आठ मन बिका करता था।
कंपनी सरकार की नई बंदोबस्त प्रणाली लागू होने और कानपुर में कलेक्टर के आने के बाद पहला सूखा 1803 में पड़ा और तब खाद्यान्न के दाम आसमान छूने लगे। उस समय कई जमींदारों ने अपनी जमींदारियां छोड़ दीं क्योंकि वे समय पर लगान अदा ही नहीं कर पाए और लाते कहां से उनकी रियाया चौपट हो गई थी। पर रेवेन्यू विभाग कोई छूट देने को तैयार नहीं था। जिले के कलेक्टर ने पूरे जिले का रेवेन्यू 233197 रुपये आँका पर वसूल नहीं हो पाया। यहां तक कि बिल्हौर सरीखे अत्यंत उपजाऊ इलाके के बूते सरकार को कोई पांच लाख का रेवेन्यू बमुश्किल आ सका। इसके बाद 1812 में फिर सूखा पड़ा मगर अंग्रेज सरकार यह नहीं तय कर सकी कि इसकी वजह कंपनी के अफसरों की नई बंदोबस्त प्रणाली थी जिसके चलते किसान बेहाल होता जा रहा था। किसान नकद लगान देने में असमर्थ था और इसके कारण गांव के गांव खाली होने लगे और लोगबाग रोजगार की तलाश में शहरों की तरफ भागने लगे। कोई कलकत्ता जा रहा था तो कोई बम्बई तो कोई अहमदाबाद। जमींदारियां बिकने लगीं। ऐसे में कंपनी के नए डायरेक्टरों ने खूब फायदा उठाया और कानपुर में फैक्ट्रियां खुलने लगीं। यह मजेदार घटना है कि किसान की बरबादी ने कानपुर को एक औद्योगिक शहर बनने को प्रोत्साहित किया।
कानपुर का इतिहास-17
कानपुर से आगरा के चक्कर में रूट बदल दिया!
स्वेज़ नहर का रूट खुल जाने की तैयारियां शुरू हो गई थीं तब अंग्रेजों ने सोचा कि यह रूट खुल जाने के बाद राजधानी कलकत्ता से शिफ्ट कर दी जाए. पहले आगरा को सोचा गया और रेल पटरियां बिछाई जाने लगीं. मगर जब कानपुर के आगे टूंडला तक लाइन बिछ गई तो पता चला कि आगरा का पानी खारा है. सेंट जोंस के पादरी ने आगरा को राजधानी न बनाने की सलाह दी. तब विचार हुआ कि कानपुर को बनाया जाए लेकिन कानपुर के लोगों का मिजाज़ बागी था. 1857 को अंग्रेज देख चुके थे. तब दिल्ली का नाम आया और यही नाम फाइनल हो गया. यूँ भी बहादुर शाह ज़फर के पतन के बाद दिल्ली मुर्दा हो गई थी. और लोगों में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने का माद्दा नहीं था. इसलिए टूंडला के बाद रेल लाइन वाया हाथरस, अलीगढ, खुर्जा दिल्ली लाई गई. कानपुर से दिल्ली का यह मार्ग करीब 50 किमी फालतू है. कानपुर से दिल्ली वाया कन्नौज, बेवर, एटा, अलीगढ शार्ट था. मगर अब हो क्या सकता था. हालाँकि रेल लाइन 1865 में पड़ गई और कालका मेल इस पर दौड़ाई गई जिसका नाम अंग्रेजों ने वन अप, टू डाउन रखा. इसी ट्रेन से वायसराय कलकत्ता से शिमला जाता था. कालका मेल चलने के बाद भी राजधानी शिफ्ट करने में लगभग 50 साल लग गए. 
कालका मेल का रुतबा हाल तक रहा है. मैं अपने बचपन में देखा करता था कि कालका को पास देने के लिए हावड़ा राजधानी कानपुर के करीब गोविन्दपुरी में रोक ली जाती थी.

कानपुर का इतिहास-18
इतिहास में किन्तु-परन्तु नहीं होता!
शंभूनाथ शुक्ल
कुछ लोगों की आदत होती है कि हर काम में लकड़ी लगाना। यह आदत फेसबुकिया समाज में ज्यादा ही होती है। इसकी वजह भी है कि ये लोग पढऩे के नाम पर बस गूगल ज्ञान लेकर आ जाएंगे और कुतर्क करने लगेंगे। मैं जो इतिहास लिख रहा हूं उसमें न तो किसी के ईगो को मैने महत्त्व दिया न किंवदंतियों को। मैने अपने इतिहास का आधार उस समय के समाज और तब के अंग्रेज लेखकों, इतिहासकारों तथा गजेटियरों, मुंशियों की निजी डायरियों, पंडों की बहियों तथा अखबारी रपटों को बनाया है। इसलिए बेहतर हो कि किन्तु-परन्तु लगाने वाले इतिहास में ही बहस करें। 
कानपुर-दिल्ली के बीच रेल लाइन बदले जाने को लेकर बहुत लोग परेशान हो गए। जबकि उसकी वजह आगरा और कानपुर का नाम अंग्रेजों ने राजधानी के लिए खारिज कर दिया था और बड़ी ही बेदिली से दिल्ली का नाम स्वीकार किया था। कुछ रपटों से तो पता चलता है कि लार्ड माउंटबेटन ने प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से राजधानी को दिल्ली से हटाने की राय दी थी। वजह थी कि पाकिस्तान के एकदम पड़ोस में होने के कारण यह शहर सदैव असुरक्षित रहेगा। यह सुझाव नेहरू जी को पसंद आ गया। पर उनकी इच्छा थी कि राजधानी इलाहाबाद बनाई जाए। इसकी एक वजह तो यह थी कि इलाहाबाद उनका अपना शहर था और दूसरे यह भी कि मुगलों की एक राजधानी कोड़ा जहानाबाद हुआ करती थी और पंडित जी खुद को किसी मुगल बादशाह से कम नहीं मानते थे। पर उनकी इस मंशा पर पानी फेरा उनके अपने ही मित्रों, रिश्तेदारों तथा शुभेच्छुओं ने यह कह कर कि जवाहर नादानी मत करो। हमें अंग्रेजों ने सिविल लाइन्स में जो एक-एक एकड़ की कोठियां एलाट की हैं उन सबकी शांति छिन जाएगी। इसलिए अपनी राजधानी और कहीं बनाओ जाकर। एक संकेत नागपुर का मिला पर नेहरू जी नहीं माने। और कोई जगह ऐसी थी नहीं जो भारत की राजधानी के लिए उपयुक्त हो सकता हो। हालांकि कानपुर था पर नेहरू जी कानपुर को पसंद नहीं करते थे। 
मजे की बात कि नागपुर का नाम प्रस्तावित करने वाले रफी अहमद किदवई थे और जब उनकी नहीं चली तो बतौर डाक मंत्री रफी साहब ने देश भर की चिट्ठियों का मुख्यालय नागपुर बनवा दिया। नागपुर वह जगह है जहां से सारी डाक केंद्रित होकर पुन डिलीवर होती थी। इसलिए किन्तु-परन्तु वाले सज्जन अपना नया इतिहास रचें मुझे ज्ञान मत दें।

कानपुर का इतिहास- 19
जुझौतियों का बंदर बन गया ययाति का टीला!
शंभूनाथ शुक्ल
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के बड़े अफसर ने मुझे फोन कर कहा कि यू नो आई आल्सो बिलांग्स टू कानपुर! इसके बाद उन्होंने मुझे बताया कि कानपुर का इतिहास हड़प्पा युग तक चला गया है. उन्होंने जाज़मऊ के टीले को एक पौराणिक राजा ययाति का महल बताया. वे अधिकारी जेएनयू प्रोडक्ट हैं और इतिहास के अध्येता हैं. मैंने उनको नमस्ते किया और विनम्रतापूर्वक कहा कि मैं कानपुर का इतिहास राजा झंडूसिंह के समय से नहीं लिख रहा मेरा काल 1780 से शुरू होता है. जब अंग्रेज अपनी छावनी बिलग्राम से उठाकर यहाँ लाए थे. मगर उन अधिकारी ने ही नहीं इतिहास को पुराण से जोड़ने का काम अंग्रेजों ने भी किया है पर वे विवेक नहीं भूले.
जेडब्लू शेफर्ड ने मराठाओं का वर्णन करते वक़्त कानपुर का इतिहास बिठूर और रमेल से शुरू किया है. वे लिखते हैं कि अयोध्या के राजा राम से उनके अमान्य (धर्मभीरु पुरुष नाराज न हों, अमान्य इसलिए लिखा है क्योंकि शेफर्ड ने उन्हें unrecognised ही लिखा है. शायद इसलिए भी कि युद्ध के पहले तक राजा राम ने उनका देय नहीं दिया था) पुत्रों- लव और कुश ने युद्ध किया था. शेफर्ड के अनुसार गंगा के दोनों किनारों पर युद्ध हुआ. एक तरफ बिठूर और दूसरी तरफ उन्नाव का बांगरमऊ इलाका. उसने यह भी लिखा है कि किंवदंतियों के अनुसार जाजमऊ का टीला ययाति का महल था. मगर पुख्ता मान्यता यह है कि चंदेल राजा चन्द्रवर्मन ने जाजमऊ से मूसानगर तक के इस इलाके पर राज किया. अलबरूनी ने ज़िक्र किया है कि कन्नौज से प्रयाग जाने वाले मार्ग पर जाजमऊ आबाद था. कहा जाता है यह इलाका चंदेलों से मेव राजाओं के पास आया. ये मेव राजे बहुत बहादुर थे और अकबरपुर के पास सेंगुर तट पर कुम्भी में उनका विशाल किला बना था. कुकेची और रहनियापुर में भी उनके किले थे. मूसानगर, मावर, शाहपुर, तूंगा और उमरगढ़ में भी. ये मेव लोग कन्नौज के राजे के अधीन थे. हालाँकि हर्ष के बाद कन्नौज का पतन होने लगा था और 1193 में शहाबुद्दीन गोरी ने कन्नौज फ़तेह कर वहां के राठौड़ राजवंश का तो खात्मा किया ही कन्नौज को भी नष्ट कर डाला. 
यह वह इलाका रहा जहाँ बुद्ध का सबसे कम असर पड़ा. बुद्ध काल में भी यहाँ वैदिकों का बोलबाला रहा और मेवों में वैष्णवों का असर था. इसके बाद राजपूत आए फिर मुसलमान. बुद्ध ने अपना कोई भी चौमासा यहाँ नहीं गुजारा और आमतौर पर बुद्धभिक्षु गंगा अथवा यमुना से निकल जाते थे लेकिन इस क्षेत्र में वे कभी नहीं रुके. इसीलिए यहाँ पर हिंदू धर्म अतीत से ही जुड़ा रहा. यहाँ तक कि आधुनिक काल में आर्य समाज के प्रवर्तक स्वामी दयानंद भी नारामऊ से गंगा पार कर लेते थे कानपुर नहीं आते थे. अगर भीतरगांव को छोड़ दिया जाए तो यहाँ के मंदिरों में कहीं भी बुद्ध शिल्प नहीं दीखता. जबकि मंदिर यहाँ हर कोस पर मिल जाएंगे.
जाजमऊ में गंगा किनारे एक टीला है जिसे ययाति अथवा जजाति का टीला कहते हैं. लेकिन ययाति एक पौराणिक राजा हैं और पुराणों में ऐसा कोई उल्लेख नहीं जिसे यह इलाका ययाति का माना जाए. यहाँ एक शिव मंदिर है जो सिद्धेश्वर महादेव मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है. चूंकि इस मंदिर के परम्परागत पुजारी जुझौतिया ब्राह्मण थे इसलिए जुझौति से ही जजाति और फिर ययाति पड़ गया हो. मालूम हो कि चंदेलों की पुरोहिताई जुझौतिया करते रहे हों और जब राजा चन्द्रवर्मन का शासन यहाँ रहा तब यही जुझौतिया बुंदेलखंड से यहाँ आकर बस गए हों. इस टीले के पास ही तब नौकाएँ लंगर डाला करती हों इसलिए इस बात की सम्भावना ज्यादा है कि जुझौतियों का यह इलाका ही ययाति का टीला कहालाने लगा हो.

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