सोमवार, 25 नवंबर 2013

प्रभु जी तुम चंदन

प्रभु जी तुम चंदन, मगर हमें पिला दो पानी!
हमारे एक चाचा थे रामाश्रय शुक्ल। वे हमारे पिता के मित्र थे और इतने प्रगाढ़ कि हमें भी बहुत उम्र के बाद पता चला कि वे पिताजी के शेष तीन भाईयों में से नहीं वरन् उनके मित्र हैं। पहले फौज में थे और बर्मा की लड़ाई में गए तथा नेताजी सुभाष की आजाद हिंद फौज मेें भी रहे। बाद में जब देश आजाद हुआ तो पहले पोस्ट मैन और फिर पोस्ट मास्टर बने। तथा इसी पद से रिटायर हुए। कानपुर में उनका घर भी उसी ब्लाक में था जहां हमारा इसलिए हम लोग परस्पर एक दूसरे के यहां तीन-चार फेरे तो लगा ही लेते थे। रामाश्रय चाचा जी सम सामयिक विषयों के इतने जानकार थे कि साठ, सत्तर और अस्सी के दशक की तमाम पत्रकाएं और अखबार उनके यहां नियमित आते थे। एक तरह से चाचा का घर मेरे लिए लायबे्ररी का काम भी करता था। मेरे पिता जी ने अपनी आत्मकथा में चाचा का वर्णन करते हुए लिखा है-
"रामाश्रय हमारी मित्र मंडली में सुमेरु थे यानी कोई भी माला सुमेरु से ही पूरी होती है। रामाश्रय को धर्म-कर्म में कोई रुचि नहीं। वे कहते हैं न मैं सगुण पंथी हूं न निर्गुण पंथी मैं तो सिर्फ अवगुण पंथी हूं। वे प्रभु से कहते हैं-
प्रभू न मैं सदाचारी न ब्रह्मचारी, न अकाली।
आप उठा लो दुनाली।
आप हैं घनश्याम आप ही हैं लालाराम
हे मेरे राम मेट दो द्वंद।
आप पुलिस और पीएसी के वेष में आओ
तड़ातड़ गोलियां बरसाओ
रामाश्रय शुक्ल अपनी व्यंग्य विधा में खूब लिखा करते हैं। यह आपका स्वाभाव है। खिलाने-पिलाने के शौकीन हैं। दिल खोलकर खिलाते हैं। खाने वाले लोग तो बहुत होते हैं पर खिलाने वाले बहुत कम। ऐसा लगता है दूसरे निराला जी हैं। प्रभु कृपा से परिवार संपन्न और शिष्ट है। आपको लगभग एक सहस्त्र मुद्रा पेंशन मिलती है (मालूम हो कि पिताजी ने अपनी यह आत्मकथा 1990 में लिखी थी)  जो आपकी जेबखर्च ही होती है। कम पडऩे पर अधिक ब्याज का लालच देकर अपनी पुत्रवधुओं से मांग लिया करते हैं। लगता है जेब में रखा पैसा उन्हें बिच्छू की डंक की तरह चुभता है, जब तक निकल न जाए चैन  नहीं पड़ता।
बालकाल में भयंकर अभावों मेेेें पले थे इसलिए दुखी के दर्द को भली प्रकार समझते हैं और उसके निवारण के लिए बहुधा घर वालों से छिपाकर भी सहायता किया करते हैं। मेरे पूछने पर आपने एक बार कहा था सखी की कमाई में सबका हिस्सा होता है। मैने इनके वे दिन देखे हैं जब घर में कुछ न होते हुए भी पूरी की पूरी तनख्वाह खोकर आते थे। लगता है रहीम जी का यह दोहा यहां पर फिट बैठ रहा है-
जीबौ तब तक हौं भलो, दीवो परइ न धीम।
जब में जीबो कुचित गति, होय न उचित रहीम।।
गुसाईं जी ने भी कहा है-
परहित बस जिनके मन मांहीं।
तिन्कंह जग दुर्लभ कछु नाहीं।।
यही कारण है पैकर से पोस्ट मास्टर का दर्जा पाकर अवकाश प्राप्त किया। चार-चार सुयोग्य पुत्रों को पाया। अब घर गृहस्थी की चिंता आपको नहीं, बस डफली बजाकर गाना शेष है।
आपके गुणों का बखान करने पूरी कापी ही छोटी पड़ जाएगी। अत: विश्राम देता हूं। कुछ अवगुण सुन लीजिए-
आप बहुत ही कान के कच्चे हैं। इसीलिए कभी-कभी अपने लोगों पर भी वाणी बाण वर्षा कर देते हैं। और भूल समझ आने पर पैरों पर पड़कर मना भी लेते हैं। फिर तो तुलसी दास जी ही कहते हैं-
जो परि पांव मनावहिं, तिनसौं रूठ विचार।
आपका शुभ नाम है- श्री रामाश्रय शुक्ल, उम्र ६२ वर्ष।
वेषभूषा- सलवार और लम्बी कमीज संभवत पठान सूट रहा होगा। पैरों में किरमिच का बाटा शू और कंधे पर लंबा झोला जिसमें डफली, ढोल, मजीरा आदि रहते हैं। आजकल मौलाना छाप दाढ़ी बढ़ा रखी है। अति श्याम रंग के शुक्ल जी हज से लौटे हाजी प्रतीत होते हैं। शिष्टता में अद्वितीय, हरेक वृद्ध के चरण स्पर्श करने में प्रवीण मानों रहीम जी का पुनरागमन हुआ हो-
धूर धरत निजी शीश पर, कहु रहीम केहि काज।
जेहि रज मुनि पत्नी तरी, सो ढूंढ़त गजराज।।
मानवतावादी शुक्ल जी के पुस्तकालय में अनेक प्रकार के दर्शन ग्रंथ रखे हैं। और उनकी संख्या बढ़ती ही जा रही है। उन्हें बड़ी ही चाव से आप अध्ययन करते हैं। शुक्ल जी सोना हैं यदि धर्म की मर्यादा में बंधकर चलें तो उसमें सुगंध आ ही जाती। फिर भी निर्गन्ध सोना है तो सोना ही।
लीक छांड़ तीनै चलैं, शायर, सिंह, सपूत।

रविवार, 17 नवंबर 2013

अपनी-अपनी पेशवाई
शंभूनाथ शुक्ल
ब्राह्मणवाद का विरोध करने वाले जाने-अनजाने उन्हीं ताकतों का सपोर्ट करते रहते हैं जिनके विरुद्ध लडऩे का वो बीड़ा उठाते हैं। चाहे वे दलित हों, ओबीसी हों या अन्य कोई भी। जिन्हें हिंदुस्तान की डायवर्सिटी का अंदाज नहीं है वे अपनी कुंठा इसी तरह निकालते हैं। जरा कुछ बाहर निकलिए तब पता चलेगा कि ठाकुर हर जगह ठाकुर नहीं है। तमाम जगह वह भेड़ भी दिखेगा न ब्राह्मण हर जगह ब्राह्मण। कई जगह उसकी जगह वहीं हैं जो अन्य परजा जातियों की होती है। किसी भी परंपरागत शादी में देखिए न्यौछावर में दस रुपये नाई के, दस रुपये कहार के, दस रुपये बारी के और दस ही रुपये बांभन के। जरा सैफई तहसील जाकर देखिए वहां ब्राह्मण व ठाकुर भेड़ व बकरी ही दिखेंगे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों में ब्राह्मण एक भिक्षुक से अधिक की हैसियत नहीं रखता। काका कालेलकर ने पंजाब में ब्राह्मणों को पिछड़ा ही माना था और खुद मंडल कमीशन ने पुजारियों, पंडों और भाट ब्राह्मणों को ओबीसी में रखा है। दरअसल यह अंग्रेजों का  फैलाया हुआ ब्राह्मणवाद है जिसके फरेब वे ये ब्राह्मण विरोधी नव ब्राह्मण उतरे और मुंह की खा गए।
इसकी शुरुआत जिस आरएसएस जैसी संस्था ने की वह दरअसल उन चितपावनों के दिमाग की उपज है जिन्होंने दो सौ सालों तक पूरब से पश्चिम तक और उत्तर से दक्कन तक उत्पात मचा रखा था। अपनी ताकत बढ़ाने के लिए वे इस कदर चौथ वसूली करते थे कि न सिर्फ दिल्ली की मुगलिया सल्तनत बल्कि पूरा राजपूताना और बंगाले और मदरासे के अंग्रेज तक थर्राते थे। उनकी नौसेना मजबूत नहीं थी वरन् वे पुर्तगालियों तक को पानी पिला देते। पेशवाओं की मराठा सेनाएं वर्षा के बाद जब निकलतीं तो उनके घोड़े किसानों की फसलेें रौंद डालते। पेशवा रघुनाथ राव तो इतना बदतमीज था कि जोधपुर के राजा जसवंत सिंह ने पेशवा को बैठने के लिए सम्मान में अपना सिंघासन ऑफर किया तो पेशवा उस पर बैठकर हुक्का पीते हुए धुआं महाराज के मुंह पर उड़ाने लगा। ये पेशवा इतने जालिम थे कि कब वे बचन से पलट जाएं और कब सारे के सारे राज्य उजाड़ दें कुछ पता नहीं। पेशवा चूंकि चितपावन ब्राह्मण थे इसलिए अंग्रेजों ने पेशवाओं से पार पाने के लिए पेशवाशाही को ब्राह्मणशाही बता दिया। जिसका असर यह हुआ कि पूरे देश में ब्राह्मणों के प्रति घोर नफरत पैदा हो गई। पर मजे की बात कि पेशवाओं ने कभी भी मुसलमानों को बाहरी नहीं समझा। ध्यान रखिए पेशवा कभी भी हिंदू पादशाही के लिए नहीं लड़े। यह अलग बात है कि शिवाजी औरंगजेब से लड़ते हुए मुस्लिम विरोधी हो गए थे। पर पेशवाओं ने तो हर एक को इस्तेमाल किया। पेशवा मराठाओं से लडऩे के लिए ओबीसी विरोधी तो थे पर वे कभी भी मुस्लिम विरोधी नहीं रहे। मैं जब तंजौर गया तो पता चला कि वहां मुसलमान भी वैसा चंदन टीका लगाते हैं जैसा कभी पेशवा लगाते थे क्योंकि तंजौर के नवाब को पेशवाओं का संरक्षण था इसलिए न तो उनका कुछ फ्रेंच बिगाड़ पाए न अंग्रेज। अंग्रेज एक चतुर कौम है इसलिए उन्होंने हिंदुओं की अन्य जातियों को तंजौर के नवाब के विरुद्ध भड़काया और प्रचारित किया कि चूंकि  इन नवाबों को ब्राह्मणों का संरक्षण है इसलिए ब्राह्मणों का विरोध करो।
पर उत्तर में तो ब्राह्मण न तो कभी शासक रहे न उस तरह के जातिवादी। पर १८५७ में ब्राह्मणों ने मुसलमानों का साथ दिया इसलिए पूरे बैसवाड़े और मध्य उत्तर प्रदेश में अंग्रेजों ने उसका धर्म, ईमान और संपदा सब छीन लिए। यही कारण है कि बैसवाड़े के ब्राह्मण और मुसलमान आपको बस्तर में मिल जाएंगे, राजपूताने में भी, गुजरात और महराष्ट्र में भी। यहां तक कि सुदूर पूर्व और पूर्वोत्तर में भी। खुद डॉ अंबेडकर भी मानते थे कि उत्तर भारत में ब्राह्मणों की स्थिति दयनीय है। पर जब ब्राह्मण विरोधी आंदोलन चले तो उसका विस्तार यहां भी हुआ और ब्राह्मणवाद विरोध की आड़ मेंं ब्राह्मण विरोध की राजनीति शुरू हो गई। ठाकुर या ब्राह्मण कोई जाति नहीं बल्कि प्रभुवर्ग है। जिसकी लाठी भैंस भी उसी की। इसीलिए मैं कहता हूं कि हिंदी के लेखक अपने समाज को नहीं जानते।

बुधवार, 18 सितंबर 2013

Hey Manniyon!

सब धान बाईस पसेरी नहीं होते!
मुझसे ब्राह्मण नाराज हैं क्योंकि ब्राह्मणों के ब्राह्मणवाद का मैं सख्त विरोधी हूं। आस्तिक नाराज हैं क्योंकि मुझे ईश्वर पर भरोसा नहीं है। आरक्षण विरोधी नाराज हैं क्योंकि मुझे लगता है कि आरक्षण सामाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़े लोगों का अधिकार है। मंडल के दिनों में भी मैं अकेला ब्राह्मण पत्रकार था जिसने जनसत्ता में पिछड़ों के आरक्षण के समर्थन में लेख लिखा था। और रामपूजन पटेल ने सार्वजनिक मंच से यह बात उद्धृत की थी। पर आज उत्तर प्रदेश की माननीय विधायक अनुप्रिया पटेल जी भी नाराज हो गईं क्योंकि उन्हें फीडबैक दिया गया कि मैने आरक्षण समर्थकों का विरोध किया है। सपा सुप्रीमो नाराज हंै क्योंकि मैं मुजफ्फर नगर के मामले में सपा सरकार के रवैये का विरोधी रहा हूं। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की ईमानदारी, उनकी नेकनीयती का मैं कायल हूं और मैं ही क्यों यूपी में जो भी संजीदा व्यक्ति होगा उनकी साफगोई का कायल तो होगा ही। पर हे माननीयों! मेरी भी बात सुन लें। मैं एक अमनपसंद शहरी हूं और जो भी मुझे न्यायसंगत लगता है मैं लिखता व कहता हूं। मुझे अगर लगता है कि किसी भी देश प्रदेश की सरकार का दायित्व है कि वह अपने मुल्क, अपने राज्य की कमजोर व अल्पसंख्यक जनता के साथ किस तरह पेश आती है। बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यकों के प्रति एक नरम रुख अपनाना चाहिए। एक बड़े भाई की तरह उनसे पेश आना चाहिए। यह सोचना चाहिए कि पहला हक उनका है जो हमारी तुलना में कमजोर रहे अथवा अपना वाजिब हक नहीं पा पाए। पर लगता है कि मेरी बात समझने की कोशिश कोई नहीं कर रहा। मुझे माननीया अनुप्रिया पटेल की पोस्ट से दुख हुआ। मेरे अपन दल के संस्थापक स्वर्गीय सोनेलाल पटेल से बेहद करीबी रिश्ते थे और अक्सर हमारा मिलना जुलना रहा करता था। पर आज उनके परिवार के समक्ष मेरी तस्वीर बतौर आरक्षण विरोधी पेश की जा रही है।

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

वही शमशेर मुजफ्फरनगरी है शायद

गुजरात की डगर पर मुजफ्फर नगर
मुजफ्फर नगर की सांप्रदायिक हिंसा ने अंदर तक हिला दिया है। मुझे गुजरात की हिंसा से दुख हुआ था और तब मैं कोलकाता में जनसत्ता का संपादक था। मैने गुजरात की हिंसा के विरोध में अन्य बंगाली संपादकों की तरह एक सेकुलर फोरम से भाषण दिया था। जिसे वहां के बर्तमान, टेलीग्राफ, टाइम्स ऑफ इंडिया, आजकल तथा आनंदबाजार पत्रिका ने छापा था। बंगाली भद्रलोक मेरे भाषण और मेरी धर्मनिरपेक्षता से प्रभावित हुआ था। पर गुजरात हिंसा पर मेरा दुख इतना ही है  जितना कि नाइन एलेवन से। मेरे फ्रेंड सर्किल में कोलकाता में बसे गुजरातियों जैसे कि दिनेश त्रिवेदी के अलावा अन्य कोई गुजराती नहीं हैं और गुजरात राज्य मेें सिवाय द्वारिका शहर के अन्य कोई शहर भी मुझे पसंद नहीं है। पर एक शहर के रूप में मुजफ्फर नगर से मेरा लगाव बहुत ज्यादा है। पांचवें दरजे में हमें यह पढ़ाया गया था कि हमारा प्रदेश जो कि एक बैठे हुए बाघ की आकृति का है, में सबसे संपन्न जिला मुजफ्फर नगर है। साल १९६३ में मुजफ्फर नगर और जालौन में सबसे जयादा ट्रैक्टर थे। तब हमारे घर में नया-नया ट्रैक्टर आया था और ट्यूब वेल लगा था सो हमें  आधुनिक और वैज्ञानिक खेती का महत्व पता था। मुजफ्फर नगर पहली बार मैं तब आया जब यहां के चौधरी नारायण सिंह यूपी में डिप्टी चीफ मिनिस्टर बने। चौधरी साहब हेमवती नंदन बहुगुणा खेमे के थे। और बहुगुणा जी से हमारे पारिवारिक रिश्ते थे। मैं मुजफ्फर नगर जाता तो चौधरी साहब की सिविल लाइन्स स्थित कोठी में ठहरता। शाम को चौधरी साहब के यहां दरबार लगता। हरेंद्र मलिक, परमजीत मलिक, सईदुज्जमां और हुकुम सिंह सब चौधरी साहब के चेले थे। खूब राजनीति बतियाई जाती। चौधरी साहब के मंझले पुत्र सुनील चौहान खुद चाणक्य की भूमिका में रहते और इतना अच्छा राजनीतिक विश्लेषण करते कि शायद आज जो पोलेटिकल कमेंटेटर आपको टीवी और अखबारों में दिखाई पड़ते हैं सब उनके सामने तौबा करते। पर वे अपने पैरों से लाचार थे। उठने-बैठने के लिए भी उन्हें सहारे की जरूरत होती। चौधरी साहब का छोटा बेटा संजय चौहान इस समय बिजनौर लोकसभा सीट से रालोद के टिकट पर सांसद हैं।
इसीलिए मुजफ्फर नगर का दंगा मुझे अंदर तक हिला गया है। यह सच है कि मुजफ्फर नगर में अपराध का ग्राफ बहुत ऊपर रहता है पर संपन्नता अपने साथ अपराध भी लाती ही है। मुजफ्फर नगर के बनियों का साम्राज्य दक्षिण तक फैला है। तमाम लोगों के तो गोआ, मुंबई व लंदन में भी  होटल हैं। गांवों में गन्ने की खेती ने यहां समृद्धि के नए द्वार खोले हैं। मेरठ और मुजफ्फर नगर के बीच होड़ चला करती है। मेधा में भी, ताकत में भी और पैसे में भी। लेकिन मुझे लगता है कि मेरठ मुजफ्फर नगर के आगे बौना है। मेरठ में साहित्यकारों के नाम पर गुलशन नंदा के नए संस्करण ही दीखते हैं जबकि मुजफ्फर नगर में शमशेर बहादुर सिंह, विष्णु प्रभाकर और गिरिराज किशोर साहित्य के आसमान पर। दंगों के लिए मेरठ तो बदनाम था पर मुजफ्फर नगर कभी नहीं रहा लेकिन देखिए अखिलेश यादव की सरकार के निकम्मेपन ने मुजफ्फर नगर को गुजरात बना दिया है। ५० हजार लोगों का पलायन गुजरात में नहीं हुआ था पर मुजफ्फर नगर से हुआ और न तो अखिलेश बबुआ कुछ कर पा रहे हैं न मुलायम चच्चा।

शनिवार, 14 सितंबर 2013

गवाह होस्टाइल हो गया

हर शरीफ शहरी की तरह मैं भी कोर्ट कचेहरी से बहुत डरता हूं। पर हर आदमी की तरह जीवन में कभी न कभी काले कोट के दर्शन करने ही पड़ते ही हैं। 1993 की मार्च में मुझे भी दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट में जाना पड़ा। मुझे इंडियन एक्सप्रेस प्रबंधन ने 1987 में हुई हड़ताल के संदर्भ में गवाह बनाया था। हड़ताल खत्म होने के बाद इंडियन एक्सप्रेस के कुछ कर्मचारियों खासकर जनसत्ता के पत्रकारों पर तेजाब फेंका गया था। जिन छह लोगों पर तेजाब फेंका गया, उनमें से एक मैं भी था। आरोप था कि कर्मचारी यूनियन के नेता टीएस रंगाराजन के इशारे पर कुछ हड़ताल समर्थक लोगों ने तेजाब फेंका था। हड़ताल खत्म हो चुकी थी इसीलिए हम लोग काम करने पहुंचे थे लेकिन कुछ लोग अभी भी हड़ताल को यथावत मान रहे थे। एक दिसंबर की रात जब हम लोग नगर संस्करण छुड़वा कर घर के लिए निकले तो प्रताप बिल्डिंग के पास कुछ लोगों ने स्टील के एक जग से हम पर तेजाब फेंका। कुछ पर ज्यादा पड़ा और कुछ पर सिर्फ छींटें ही पड़ीं। जिन पर छींटें ही पड़ीं उनमें से एक मैं भी था। इंडियन एक्सप्रेस प्रबंधन ने एक मुकदमा कायम कराया और पुलिस की डायरी में मेरा भी नाम बतौर गवाह डलवा दिया गया। उस समय दिल्ली में पुलिस की डायरी उर्दू में भरी जाती थी इसलिए मुझे पता ही नहीं चला कि मेरे दस्तखत कहां कराए गए हैं। कुछ दिन बाद बताया गया कि हमें अपने ही हड़ताली साथियों के विरोध में गवाही देनी है कि उन्होंने ही तेजाब डाला। अब यह सरासर गलत था क्योंकि साफ-साफ हम देख ही नहीं पाए कि तेजाब डालने वाले कौन लोग थे। इसलिए मैने तो गवाही देने से मना कर दिया। लेकिन पांच साल बाद एक दरोगा हमारे घर आया और दबाव डालने लगा कि सर आप कोर्ट कल चले ही जाइएगा वर्ना आपके नाम गैर जमानती वारंट जारी हो जाएगा। खैर मैं गया तीस हजारी कोर्ट। वह ठीक वैसा ही था जैसा कि बांदा, झांसी, उरई, हमीरपुर आदि के कोर्ट होते हैं। जीनों के कोने पर पान की पीकें और वकीलों के बस्तों पर उदास अंाखों वाले क्लांइट्स की भीड़। खैर एक मेट्रोपालिटन मजिस्ट्रेट की अदालत में मेरा नंबर भी आया। नाम जैसे ही बुलाया गया मैं फटाफट हाजिर हो गया। वकील ने कहा कि आप पर तेजाब पड़ा था? मैने कहा कि हां। उसने कुछ लोगों की तरफ इशारा कर कहा कि यही लोग थे? मैने कहा नहीं। उसने अब मजिस्ट्रेट से कहा कि सर गवाह होस्टाइल हो गया है। यह होस्टाइल शब्द मुझे गाली जैसा ही लगा। मैने जज साहब से कहा सर मैं कतई होस्टाइल नहीं हुआ हूं। वकील साहब बताएं कि मैने ऐसा कब बयान दिया है कि मैं इन्हें पहचानता हूं? दिसंबर १९८७ की दरिया गंज पुलिस थाने की डायरी का वह पेज मंगाया गया। पर उसे न तो वकील साहब पढ़ पाए न पेशकार और न ही जज साहब। बड़ी विचित्र स्थिति थी। लंच तक सब इसी में उलझे रहे। मैने कहा सर इसमें यह लिखा ही नहीं है कि मैने इन लोगों को देखा था। मैं उर्दू पढ़ सकता हूं और वकील साहब जान बूझकर गलत बातें कर रहे हैं। एक मुल्ला जी आए और वे संयोग से उन्हीं लोगों के समर्थक थे जिन पर तेजाब फेंकने का आरोप था। उनसे पढ़ाया गया और उन्होंने मेरी ही बात की तस्दीक की। लिहाजा जज साहब ने मुकदमा खारिज ही कर दिया। वैसे प्रबंधन भी इस केस को खत्म करने का ही इच्छुक था। ऊपर से उर्दू की डायरी पढ़े जाने की जहमत। इसलिए जज साहब ने वकील साहब को नसीहत दी कि भविष्य में वे जब भी कोई केस लेकर आएं पहले होमवर्क कर लिया करें। अब वकील साहब ने उनकी नसीहतों पर पालन किया होगा, पता नहीं। लेकिन मुझे लगता है कि आने वाले 25 वर्षों के भीतर पुलिस डायरी के हिंदी में लिखे पेज भी पढऩे वाला कोई नहीं होगा क्योंकि अब वकालत की भाषा लोकल कोर्ट में भी अंग्रेजी हो गई है। अगर हिंदी में कोई शब्द लिखा भी जाए तो उसे रोमन में लिखा जाता है। जय हो हिंदी मैया की

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

हुज्जते बंगाल से भिडऩा आसान नहीं

हुज्जते बंगाल से भिडऩा आसान नहीं
शंभूनाथ शुक्ल
कोलकाता का प्रेसीडेंसी कालेज बहुत पुराना और प्रतिष्ठित कालेज रहा है। अब उसे विश्वविद्यालय का दरजा मिल गया है। यहां बुधवार को तमाम अशोभनीय घटनाएं घटीं। इस विश्वविद्यालय के कैंपस में बुधवार को कुछ प्रदर्शनकारी घुस गए और वहां की सर जगदीशचंद्र वसु लैब में काफी तोडफ़ोड़ की। फौरन कुलपति मालबिका सरकार ने मीडिया वालों को बुलवाया और आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारी तृणमूल कांग्रेस की छात्र इकाई से थे। वे तृणमूल कांग्रेस का झंडा लिए हुए थे तथा उनका नेतृत्व स्थानीय सभासद पार्थो बसु कर रहे थे। इसके बाद हंगामा मचना स्वाभाविक था। राज्य के उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी ने अगले ही रोज आरोप लगाया कि कुलपति ने बगैर कुलाधिपति को बताए मीडिया से बात कर ली और इस बात की उन्होंने पुष्टि नहीं की कि प्रदर्शनकारी तृणमूल के थे भी या नहीं। इसका असर यह पड़ा कि मालबिका सरकार ने गुरुवार को दोपहर बाद शिक्षा मंत्री सुब्रत मुखर्जी के साथ एक प्रेस वार्ता की और बात साफ की कि वे लोग तृणमूल का झंडा तो लिए हुए थे लेकिन उनमें तृणमूल का कोई नेता नहीं था।
माकपा ने कुलपति के इस बयान की तीव्र आलोचना की है। माकपा का आरोप है कि तृणमूल सुप्रीमो विश्वविद्यालयों का राजनीतिकरण कर रही हैं। हालांकि यह आरोप उतना ही माकपा पर भी फिट बैठता है। पश्चिम बंगाल के विश्वविद्यालयों और शिक्षा संस्थानों का राजनीतिकरण पहले माकपा ने ही किया था और प्रसीडेंसी कालेज तो उसका प्रिय अखाड़ा रहा है। माकपा के ज्यादातर बड़े नेता, यहां तक कि पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य भी इसी कालेज से पढ़े थे। इसलिए प्रेसीडेंसी कालेज में राजनीति होनी स्वाभाविक ही है।
माकपा के छात्र संगठन एसएफआई के एक कार्यकर्ता सुदीप्तो घोष की हत्या के बाद से पश्चिम बंगाल की राजनीति गरमा गई थी। माकपा ने पूरे राज्य में धरना प्रदर्शन कर तृणमूल को कठघरे में खड़ा कर दिया था। प्रदेश की राजनीति की उथलपुथल से घबरा कर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ९ अप्रैल को दिल्ली में प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री पी चिदंबरम से मिलने के लिए आई थीं। पर मुलाकात के कुछ पहले ही उनके वित्त मंत्री अमित मित्रा के साथ दिल्ली स्थित योजना भवन के सामने एसएफआई के कुछ लोगों ने बदतमीजी कर दी। उनका कुरता फाड़ दिया और उनसे हाथापाई भी की। ममता के तेवर फिर गरम हो गए और उन्होंने प्रधानमंत्री से मिलने से मना कर दिया। केंद्रीय संसदीय कार्य राज्य मंत्री राजीव शुक्ल ममता बनर्जी को समझाने गए तो उन्होंने राजीव शुक्ल को डांट दिया और वापस कोलकाता लौट गईं। जहां ब्लड पे्रशर नीचे हो जाने के कारण उन्हें वहां के बेलव्यू अस्पताल में भरती कराया गया।
सवाल यह उठता है कि पश्चिम बंगाल में जरा-जरा सी बात पर हिंसा क्यों हावी हो जाती है। यूं हुज्जते बंगाल मशहूर है यानी बंगाल के खून में ही हुज्जत करना है। शायद वहां का क्लाईमेट ऐसा है कि लोगबाग जरा सा भी विचलन बरदाश्त नहीं कर पाते। या तो आप हमारी तरफ हैं अथवा दुश्मन खेमे की तरफ और दुश्मन का सफाया बंगाल में मान्य है। १९६७ में शुरू हुई नक्सली हिंसा से लेकर आजतक बंगालियों की मानसिकता में हिंसा को एक मान्यता मिल चुकी है। अपने कोलकाता प्रवास के दौरान की एक घटना यहां बताना समीचीन होगी।
मार्च सन् २००० की तीन या चार की तारीख की रात थी। अखबार का सिटी एडिशन छुड़वा कर मैं अपने घर के लिए निकला ही था कि हाथी बागान में एक युवक दौड़ा-दौड़ा आया और मेरी एंबेसडर कार की बोनट पर एक धारदार हथियार का वार किया। मैं तो सन्न। अभी कोलकाता में जनसत्ता का संपादक पद संभाले हुए कुल तीन ही दिन हुए थे। इतनी जल्दी भला किसी से क्या दुश्मनी होगी? चंडीगढ़ जैसे साफ-सुथरे शहर से आया था इसलिए कोलकाता की गलियों और यहां की आबोहवा से बहुत परिचित भी नहीं था। भीड़ ने कार घेर ली और बांग्ला में जोर-जोर से कुछ बोलने लगे। मुझे डर भी लगा तभी ड्राइवर कार से  उतरा और उसने उन्हें कुछ समझाया और वे नोमस्कार दादा बोलते हुए चले गए। बाद में ड्राइवर ने बताया कि ये लोग माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के लोग थे और वे तृणमूल पार्टी के लेागों को पीटने के लिए सड़क पर उतरे थे। हुज्जते बंगाल के पहले दर्शन हुए।
तब तक पश्चिम बंगाल में वामपंथी गठजोड़ को राज करते हुए २३ साल हो चुके थे तथा बतौर मुख्यमंत्री ज्योति वसु को भी। लेकिन अब वामदलों का पानी उतरने लगा था। ममता बनर्जी की तृणमूल धीरे-धीरे अपनी पैठ बनाती जा रही थी। मुस्लिम इलाकों और पश्चिम बंगाल के शहरों में ममता की पार्टी की साख बढ़ रही थी। रोज कोई न कोई झगड़ा कहीं न कहीं हो ही जाता था। दोनों पार्टियों के तमाम कार्यकर्ता मारे जा चुके थे। निष्कर्ष यह निकला कि ज्योति वसु को हटाकर माकपा पोलित ब्यूरो ने बुद्धदेव भट्टाचार्य को मुख्यमंत्री बना दिया। बुद्धेदव बाबू ने अपनी अगुआई में २००१ का चुनाव जितवा दिया और २००६ का भी। पर २००९ के लोकसभा चुनाव में तृणमूल और कांग्रेस को अच्छी खासी तादाद में सीटें मिल गईं। तभी से लग गया था कि अगला विधानसभा चुनाव अब वाम गठजोड़ नहीं जीत पाएगा और वही हुआ भी। २०११ में वामपंथी दल बुरी तरह हारे और ममता ने अपने बूते पश्चिम बंगाल में सरकार बना ली। वामदलों ने पश्चिम बंगाल में पूरे ३४ साल राज किया।
लेकिन वह संयम जो वामदलों में था वह ममता की तृणमूल में देखने को नहीं मिला। ममता का कांग्रेस से गठजोड़ टूटा और ममता ने दिल्ली आना ही बंद कर दिया। लेकिन बिना दिल्ली की मदद के कोई भी क्षत्रप अपना राजकाज सुचारू रूप से नहीं चला सकता इसीलिए ममता ९ अप्रैल को दिल्ली आई थीं। दिल्ली की केंद्र सरकार को भी ममता के सहारे की जरूरत है इसीलिए राज्यपाल इतने हंगामे के बावजूद ममता की तारीफ कर रहे हैं और वामदलों की निंदा। लेकिन जहां गुस्सा नाक पर बैठा हो वहां की किसी भी पार्टी से हर समय सहारे की उम्मीद करना बेमानी होगी।

बुधवार, 11 सितंबर 2013

मदारी पासी के जरिए किसानों का एका

मदारी पासी के जरिए किसानों का एका
शंभूनाथ शुक्ल
स्वतंत्रता की पहली लड़ाई १८५७, जिसे अंग्रेजों ने गदर कहा है को दबा देने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के अफसरों ने अवध के किसानों का सबसे ज्यादा दमन किया। जमीनें उनसे छीनकर अंग्रेजों के दलाल जमींदारों के अधीन कर दी गईं और वे जमींदार अंग्रेजों के एजेंट के तौर पर काम करते थे। एक मई १८७६ को महारानी विक्टोरिया ने इंडिया को ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन कर लिया। लेकिन इससे न तो भारत का भाग्य बदला न किसानों की पीड़ा। उल्टे अब दो-दो स्तर पर उनका दमन होता था। अंग्रेज सरकार अपने स्तर पर उनका दमन तो करती ही थी स्थानीय महाजनों, साहूकारों और जमींदारों ने कभी बेगार के बदले तो कभी सूद के बदले उनके खेत व जेवर छीनने शुरू कर दिए। किसानों की बहुएं बेटियां भी इन जमींदारों की क्रूरता के चलते सुरक्षित नहीं थीं। ऊपर से नगदी लगान के कारण वे साहूकारों व महाजनों के आगे पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी जमीन जायदाद ही गिरवी नहंी रखते गए वरन् खुद को भी गिरवी रखते गए। बीसवीं सदी शुरू होते ही बंगाल सूबे का बटवारा हो गया और नई रैयतवारी व्यवस्था तथा बंदोबस्त प्रणाली लागू हुई। अवध के किसानों पर इसका और भी बुरा असर पड़ा। जमीनें बढ़ाने के लिए जंगलों को तोड़ा जाने लगा और नौतोड़ की इस व्यवस्था में किसानों ने मेहनत तो खूब की पर उन्हें उसका अपेक्षित लाभ नहंी मिला। उपजाऊ नई जमीनें समतल तो किसान करते लेकिन जैसे ही उनमें फसल उगाने का क्रम शुरू होता उन पर लगान की नई दरें लागू हो जातीं। किसान सपरिवार मेहनत कर जमीनें तोड़ते लेकिन इसका लाभ उन्हें नहीं मिलता। यह वह दौर था जब पूरे अवध के इलाके में किसान बुरी तरह पीडि़त था। कांग्रेस के आंदोलन का लाभ शहरी व्यापारियों को तो मिला लेकिन किसान उससे वंचित रहे। कौंसिलों में शहरी मध्यवर्ग की चिंताओं को लेकर तो हुक्मरान चिंता करते पर किसानों का वहां जिक्र तक नहंी होता।
ऐसे समय में मोहनदास कर्मचंद गांधी फलक पर प्रकट होते हैं और निलहे गोरों के जुल्मों को उघाड़ कर किसानों की पीड़ा को उन्होंने धार दी। चंपारन में राजकुमार शुक्ल के साथ मोतिहारी जाकर उन्होंने किसानों की पीड़ा को महसूस किया। उन्होंने अपनी लिखा पढ़ी और अपनी वकालत की ताकत से किसानों को निलहे गोरों के जुल्म से आजाद कराया। लेकिन गांधी जी  इसके बाद कांग्रेस के बड़े नेता हो गए। कांग्रेस ने उन्हें हाथों हाथ लिया और वे धीरे-धीरे किसान आंदोलन से दूर होते गए। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से किसानों का गांधी से मोहभंग हो गया। अब किसान आंदोलन में कांग्रेस की भूमिका सिर्फ जमींदारों और सेठ साहूकारों के हितों के पोषक भर की रह गई। पूरे अवध के इलाके में किसान तबका बुरी तरह परेशान था। शहरी क्षेत्रों में नई मिलें खुल जाने तथा रेलवे, कचेहरी और व्यापार के चलते गांवों का पढ़ा लिखा तबका शहर आ बसा। और शहरों की इस कमाई से उसने गांवों में जमींदारी खरीदनी शुरू कर दीं। ये नए कुलक किसी और गांव में जाकर जमींदारी खरीदते और अपनी रैयत से गुलामों जैसा सलूक करते। इन नए शहरी जमींदारों को कांग्रेस का परोक्ष समर्थन भी रहता। इसीलिए किसानों की गांधीबाबा से दूरी बढऩे लगी। यह वह दौर था जब अवध में किसानों के संगठन बाबा रामचंदर या मदारी पासी के नेतृत्व में बनने लगे। बिहार में त्रिवेणी संघ और अवध में तीसा आंदोलन इसी दौर में पनपे। इनको परोक्ष रूप से क्रांतिकारी संगठन हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी और साम्यवादी संगठनों का भी समर्थन था। सत्यभक्त, राधा मोहन गोकुल जी, राहुल संाकृत्यायन, स्वामी सहजानंद भी किसानों को संगठित करने में लगे थे। यह तीसा आंदोलन काफी व्यापक रूप से फैला लेकिन गांधी जी के असहयोग और जवाहर लाल नेहरू की उदासीनता के चलते यह आंदोलन अंग्रेजों द्वारा कुचल दिया गया पर इससे यह समाप्त नहंी हुआ। अंग्रेजों को किसानों को तमाम सहूलियतें देर सबेर देनी पड़ीं और एक निश्चित अवधि के बाद किसानों को जमीन पट्टे पर लिखनी पड़ीं।
इस किसान आंदोलन ने पत्रकारिता के साथ-साथ उस दौर के कथा साहित्य पर भी व्यापक असर डाला। प्रेमचंद का गोदान गुलाम बनते किसानों की पीड़ा को दर्शाता है कि कैसे होरी बाद में किसान से मजूर बन गया। किस तरह किसान पीडि़त था और कैसे उसे सेठ साहूकार और महाजन तथा जमींदार कभी-कभी लगान के नाम पर तो कभी बेगार के नाम पर और कभी धर्म के नाम पर परेशान कर रहे थे। मशहूर अंग्रेजी उपन्यासकार मुल्कराज आनंद ने १९४२ में अपना मशहूर उपन्यास द स्वोर्ड एंड द सिकल ( ञ्जद्धद्ग स्2शह्म्स्र ड्डठ्ठस्र ञ्जद्धद्ग स्द्बष्द्मद्यद्ग) रायबरेली के किसान आंदोलन पर ही लिखा है। असंख्य कविताएं भी इस दौर में लिखी गईं। पर हिंदी में इस आंदोलन को केंद्र में रखकर कोई भी उपन्यास नहीं लिखा गया। हालंाकि कमला प्रसाद त्रिपाठी ने पाहीघर, अमृतलाल नागर ने गदर के फूल और अमरकांत ने १८५७ को आधार बनाकर किसानों पर कुछ अच्छे उपन्यास लिखे। लेकिन मदारी पासी और बाबा रामचंदर के आंदोलन पर कुल जमा दो ही उपन्यास उल्लेखनीय हैं। एक तो कमला प्रसाद त्रिपाठी का बेदखल और दूसरा कामतानाथ का काल कथा। बेदखल बाबा रामचंदर के तीसा आंदोलन पर लिखा गया है। जबकि काल कथा के केंद्र में मदारी पासी है। इसके अलावा वीरेंद्र यादव का शोध इस आंदोलन की सर्वाधिक प्रामाणिक जानकारी देता है। कामतानाथ का उपन्यास काल कथा के केंद्र में दूसरे विश्व युद्ध के बाद का दौर है जब देश में हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी कांग्रेस के समानांतर एक संगठन बन गया था और लोगों में गांधी से मोहभंग होने लगा था। काल कथा में हालांकि कामता जी ने शहरी आंदोलन पर ज्यादा फोकस किया है लेकिन अवध के गांवों की मानसिकता तथा वहां पर हो रही सुगबुगाहट को उन्होंने अनदेखा नहीं किया है।
दरअसल कामतानाथ समानांतर कथा अंादोलन की उपज थे इसलिए उन्होंने वही लिखा जिसे करीब से देखा, महसूस किया और सुना। निजी जीवन में वे एक शहरी थे। पूरा जीवन उनका लखनऊ व कानपुर में कटा। रिजर्ब बैंक में स्टाफ अफसर थे लेकिन गांव और गंवई परिवेश की इतनी समझ कम लोगों के पास रही होगी। उनका सपना था बीसवीं सदी के शुरुआती तौर के अवध के गांवों की एक तस्वीर अपनी कलम से उतार देने की। इसीलिए उन्होंने काल कथा को चार खंडों में लिखने की योजना बनाई थी पर दो लिखने के बाद ही काल ने उन्हें हमसे छीन लिया। लेकिन इन दो खंडों में ही वे अपनी पूरी बात कहते हुए प्रतीत होते हैं। एक कानून गो कायस्थ परिवार के सहारे उन्होंने इस उपन्यास का ताना बाना बुना और उसमें एकदम खरे उतरे। उस समय उन्नाव और लखनऊ के गांवों में किसान कैसी समस्याओं से जूझ रहे थे और ताल्लुकेदार अपनी ऐयाशियों मेें डूबे हुए थे। लेकिन अंदर ही अंदर किसानों के अंदर ताल्लुकेदारों के खिलाफ, अंग्रेज निजाम के खिलाफ और गंाव के अंदर परंपरागत ढांचे के खिलाफ एक गुस्सा फूट रहा था इसका अच्छा विवरण काल कथा में मिलता है। वे किसान जो अंगे्रजों की नई बंदोबस्त प्रणाली के कारण किसान से मजदूर बनते जा रहे थे और खेती का दायरा सिमटता जा रहा था, लगातार सुलग रहे थे। भले कांग्रेस किसानों के मामले में एक रहस्यमयी चुप्पी साधे हो पर तमाम ऐसे लोग थे जो इस आंदोलन को हवा दे रहे थे। इसमें किसान सभा से लेकर मदारी पासी का आंदोलन तक था। कामतानाथ ने इन सब आंदोलनों को बखूबी मुखर किया है कालकथा में।
पहले विश्वयुद्ध के कुछ पहले जब निलहे गोरों से किसानों को मुक्ति मिल गई थी तो देसी निलहों ने उन जमीनों पर कब्जा कर लिया और अपने कारकुनों के सहारे किसानों पर जुल्म करने लगे। लगान नगद देने की व्यवस्था के कारण किसान के पास कुछ हो या न हो लगान भरना ही पड़ता था। एक ऐसे समय जब फसलों के नगदीकरण की कोई व्यवस्था न थी लगान नगद देने के कारण अवध के किसान बेहाल थे। किसानी सिर्फ उनकी मर्यादा के लिए जरूरी रह गई थी। उन्नाव के एक  गांव चंदन पुर में कानून गो मुंशी रामप्रसाद रहा करते थे। जिनके पास खेती के साथ-साथ कानून गो जैसी नौकरी के कारण गांव में काफी रसूख था और गाजी खेड़ा के ताल्लुकेदार अब्दुल गनी जैसे लोग भी उन्हें बराबरी का मान देते हैं। मुंशी जी के तीन बेटे हैं। जिसमें से बड़े लक्ष्मी गांव में रहते हैं और मझले लखनऊ कचहरी में पेशकार हैं तथा तीसरा दसवीं में कई बार बैठता है पर हर बार फेल हो जाने के कारण लखनऊ चला जाता है नौकरी के लिए। बड़े बेटे लक्ष्मी का बेटा बच्चन भी चाचा के  पास चला जाता है लेकिन जल्दी ही वह लखनऊ में चल रहे राजनीतिक आंदोलनों के प्रभाव में आ जाता है। बस इसी बच्चन के सहारे पूरे उपन्यास का तानाबाना बुना गया है। बच्चन कांग्रेस के विदेशी वस्त्रों की होली जलाए जाने के आंदोलन से शुरू कर खुद को क्रांतिकारियों के बीच जल्द ही पाता है और तब उसे पकड़ कर लाहौर ले जाया जाता है जहां उसे फांसी दे दी जाती है। लेकिन इसके बीच उस समय अवध के गांवों में चल रहे आंदोलन को भी बखूबी उघाड़ा गया है। सबसे ज्यादा अपील करता है मदारी पासी का आंदोलन, जो एक मिथकीय चरित्र जैसा लगता है लेकिन उसके आंदोलन ने न सिर्फ सांप्रदायिक सद्भाव पैदा किया वरन् गांवों में नीची कही जाने वाली जातियों में ऐसा रोमांच पैदा किया कि गांवों के बड़े बड़े रसूख वाले लोगों को उनसे बेगार लेना या उनकी औरतों के साथ बदतमीजी महंगी पडऩे लगी। लेकिन इसके लिए मदारी ने उन्हें तैयार किया।
मदारी के पहले चंदन पुर के पास की अछूत बस्ती दुर्जन खेड़ा में मुंशी जी के बेटे के रिश्ते के साले तेज शंकर, जो कांग्रेस के समर्पित सिपाही हैं, एक चेतना पैदा करते हैं। बूढ़े खूंटी की पुत्रवधू टिकुली के रूप में वहां तेजशंकर को ऐसी साहसी महिला मिलती है जो उस पूरे इलाके में गांधी जी के आंदोलन को हवा देती है। टिकुली का ही साहस था कि वहां मदारी पासी अपनी सभा कर पाते हैं वर्ना अब्दुल गनी और ठाकुर ताल्लुकेदार उस पूरी बस्ती को तहस-नहस कर डालने पर तुले थे। उन्नाव, लखनऊ और सीतापुर व हरदोई में मदारी पासी की लोकप्रियता बिल्कुल गांधी जी की तर्ज पर कुछ अलौकिक किस्म की थी। मसलन उनके बारे में कहा जाता था कि वो हनुमान जी की तरह उड़कर कहीं भी पहुंच जाते हैं। गंाधी जी के साथ उनका चरखा जाता था और मदारी पासी के साथ उनकी चारपाई और छोटी कही जाने वाली अछूत जातियां उन्हें भगवान की तरह मानती थी। पासी जातियां उन्हें अपना गांधी ही मानती थीं और उनके बारे मेें वे गर्व से कहती थीं कि उईं हमार पंचन के गांधी आंय। कामतानाथ ने इसका वर्णन करते हुए लिखा है कि दुर्जन खेड़ा में जब मदारी पासी के आगमन की बात सुनी गई तो मानों सारी छोटी जातियां- चमार, पासी, काछी, नाई, धोबी, डोम, बेहना, कहार, मनिहार और तमाम गरीब किसान जातियों में उत्साह की लहर दौड़ गई और उन सबका एका सम्मेलन आयोजित किया गया। तब तक इन जातियों का इस बात का अहसास होने लगा था कि अगर गांधी जी व कांग्रेस के प्रयास से आजादी मिल भी गई तो गोरे तो चले जाएंगे लेकिन गांवों में ठाकुरों व बांभनों का ही राज चलेगा और ये उसी तरह अत्याचार करते रहेंगे जैसा कि आज हो रहा है।
मदारी पासी के किसी गांव में जाने के पहले उनके लोग उस गांव में जाते और इन नीची जातियों को एक पोटली को छुआकर कसम दिलाते कि वे एक रहेंगे। इस पोटली में एक ज्वार की रोटी और एक टुकड़ा मांस का होता। इसमें रोटी का मतलब होता- ईका मतलब है कि हमार पंचन की लड़ाई रोटी की है या समझ लेव कि पेट की आय अउर मांस का मतलब कि इस लड़ाई में अपने सरीर का मांस तक देंय पड़ सकत है। कामतानाथ लिखते  हैं कि गांव के लोग इसकी व्याख्या यूं करते- मेहनत हमार, धरती की छाती मां हल चलाई हम, फसल काटी हम अउर फल खाएँ सेठ-साहूकार, कि ठाकुर-जमींदार, सो यू अब न चली। जान भले चली जाए मुदा अपन हक हम अब लइके रहब।
इन जातियों को लगता था कि शायद खून खराबा भी होएगा इसलिए जब दुर्जन खेड़ा के कुछ उत्साही युवकों ने पूछा कि का हम कांता-बल्लम लइके आई? तो बुजुर्गों ने समझाया- नहीं कांता-बल्लम अबै न लाओ। जब उइकी जरूरत परी तब वहौ कीन जाई। मदारी पासी अपने साथ सत्यनारायण की कथा की एक किताब और कुरान शरीफ की प्रति लेकर चलते थे। उनके साथ एक पंडित और एक मौलवी भी रहता था जो उन्हें सुनने वाले श्रोताओं को शपथ दिलाते थे कि तुम अपने धर्म की इन किताबों की कसम खाकर कहो कि मदारी पासी की इस लड़ाई में तुम बराबर के साथी रहोगे। मदारी पासी के आगमन पर उसका चित्रण करते हुए कामतानाथ ने लिखा है- "आखिर कोई चार बजे मदारी पासी का आगमन हुआ। भरा हुआ गठीला शरीर, गोल चेहरा, पक्का सांवला रंग, घनी काली गलमुच्छें, सिर के बालों पर मशीन चली हुई, कुर्ता और धोती, कमर में अंगोछे का फेंटा तथा पैर में चमरौधे का जूता। हाथ में लंबा सा बल्लम तथा कमर के फेंटे में तलवार, साथ में लगभग इसी वेशभूषा में चार अंगरक्षक। उनके पीछे एक झोले में सत्यनारायण कथा का सामान और एक गुटका रामायण तथा दूसरे में पीतल के एक पात्र में गंगाजल लिए हुए एक पंडित तथा हरे रंग के कपड़े के बस्ते में कुरान लपेटे हुए एक मौलवी। उनके अतिरिक्त सिर पर उल्टी चारपाई रखे उस पर एक गठरी में खाने पीने का कुछ सामान, गुड़, सत्तू आदि, हुक्का, तंबाकू, लोटा डोर, चारपाई पर बिछाने के लिए एक कथरी और चादर तथा मदारी के दो-एक वस्त्र लिए हुए दो और लोग।"                                                                                                         
मदारी पासी अपने भाषण में साफ कहते थे कि "उन्हें बाबा भले कहा जाए पर न तो हम गांधी बाबा हैं और न गांधी बाबा के आदमी हैं। वैसे हमारा उनसे कोई बैर नहीं है। हम भी चाहते हैं कि अंग्रेज इस मुल्क से चले जाएं। मगर हमारी समस्या दूसरी है। अंग्रेज जाएंगे तो अच्छा ही होगा लेकिन हमको तो हमारे हिंदुस्तानी भाई ही चूसे हैं। खेत हम जोतें और फसल ले जाएं सेठ साहूकार और जमींदार। बेगार भरें सो अलग। उस पर हमारी बहू बेटियों की कोई इज्जत नहीं। इस सबकी एक ही वजह है कि हम एक नहंी हैं। इसी लिए हम गांव-गांव घूम कर एका सम्मेलन कर रहे हैं।" मदारी कुछ प्रतिज्ञाएं भी अपने श्रोताओं से कराते थे। जैसे "हम आज से बेगार नहीं भरेंगे। अगर हमारे एक भाई का खेत साहूकार या जमींदार छीनता है तो हमारा दूसरा भाई उससे बटाई पर खेत नहीं लेगा तथा न ही नीलामी में बोली बोलेगा। साहूकार या महाजन को मुनासिब सूद से ज्यादा पैसा नहीं देंगे। सूद के बदले आनाज तो देंगे ही नहीं। काहे कि आनाज दिन-ब-दिन मंहगा होता जा रहा है और साहूकार हमसे कम पैसों में ज्यादा आनाज ले लेता है। साथ ही हमारी बहू बेटियों पर किसी ने बुरी नजर डाली तो हम उसकी आँख निकाल लेंगे।"
मदारी पासी के इस ओजपूर्ण भाषणों को सुनने के लिए अवध के किसान बाट जोहते थे कि कब मदारी बाबा उनके यहां आएंगे। और मदारी भी गांव-गांव जाकर अपने आंदोलन की जमीन तैयार कर रहे थे। यह अलग बात है कि चाहे वह कांग्रेस हो या मुस्लिम लीग किसान आंदोलन से बराबर की दूरी रखते थे। भले वे आपस में एक मंच पर आकर बात करने को तैयार रहें लेकिन मदारी पासी के आंदोलन को दबाने के लिए वे सरकार को पूर्ण सहयोग करते थे। बाबा रामचंदर के आंदोलन में पिछड़ी जाति के किसान थे लेकिन मदारी पासी ने अछूत कही जाने वाली जातियों में आत्म सम्मान का भाव पैदा किया। मदारी पासी अपनी माटी की ही उपज थे और वे कोई चतुर सुजान नेता नहीं थे लेकिन अनवरत संघर्ष से जो जज्बा पैदा होता है वह मदारी पासी में खूब था। इसके उलट बाबा रामचंदर महाराष्ट्र से भटकते हुए दक्षिण अफ्रीका गए वहां उन्होंने मजदूर आंदोलन में हिस्सा लिया और जब वहां से उन्हें देशनिकाला दे दिया गया तो भारत आकर इलाहाबाद में बस गए। वे महाराष्ट्रियन ब्राह्मण थे इसलिए न चाहते हुए भी उनके अंदर बाल गंगाधर तिलक के प्रति सम्मान का भाव था और वे कांग्रेस से उतनी दूरी नहीं रखते थे जितनी कि मदारी पासी। बाबा रामचंदर के आंदोलन का आधार वे पिछड़ी जातियां थीं जो समाज में सम्मान की लड़ाई लड़ रही थीं और उनके पास कुछ बहुत जमीनें भी थीं पर जमींदार उन पर जबरन कब्जा कर लेते थे। इन पिछड़ी जातियों की बहू बेटियों पर ठाकुर जमींदार उतनी आसानी से नजर नहीं डाल पाते थे जितनी सहजता से वे मदारी पासी के साथ जुड़ी जातियों की बहू बेटियों पर। इसलिए दोनों आंदोलनों को जोडऩा फिजूल है। मदारी पासी एक हथियारबंद लड़ाई लड़ रहे थे जिसकी तुलना आज के नक्सली आंदोलन से की जा सकती है।
कामतानाथ ने दुर्जन खेड़ा की जिस टिकुली का जिक्र किया है वह महिला गांधीवादी तेज शंकर के प्रभाव में आकर चरखा कातने लगती है और यह चरखा उसके लिए मंदिर है, आस्था का केंद्र है। उधर जब मदारी पासी उसके गांव में आते हैं तो वह उनकी हर बात पर गांठ बांध लेती है और बड़कऊ ङ्क्षसह जमींदार, रामप्रसाद कानून गो तथा अब्दुल गनी जैसे ताल्लुकेदारों द्वारा पुलिस से पिटवाए जाने के बावजूद वह अपनी आस्था से नहीं डिगती। यह था उस आंदोलन का असर जो एक तरफ तो गांधी जी शुरू कर रहे थे दूसरी तरफ मदारी पासी।
कामता जी काल कथा को चार खंडों में लिखना चाहते थे। १९९८ में जब ये दोनों खंड छप कर आए तो उन्होंने मुझसे कहा था कि देखो शंभू बाकी के दो खंड भी जल्दी ही छप जाएंगे। लेकिन वे अपनी बीमारी और व्यस्तताओं में ऐसे उलझे कि काल कथा के बाकी दो खंड लिखने के पूर्व ही क्रूर काल ने उन्हें हमसे छीन लिया।