मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

खाप की पोलमपोल!

लालडोरे से घिरी जातीय पंचायतें
शंभूनाथ शुक्ल
मेरी पत्नी और मैं दोनों भारद्वाज गोत्र के हैं। हमारी शादी को 38 साल बीत चुके हैं पर अब तक सामान्य बातों को छोड़ दिया जाए तो न तो कभी परस्पर कोई झगड़ा हुआ न ही समगोत्री होने के कारण हमारे बच्चों को किसी तरह की जेनेटिक बीमारियों से जूझना पड़ा। शादी हमारे परिवारों की मर्जी से हुई थी तब किसी ने न तो कुंडली मिलवाई थी न ही हमारा परिवार किसी तरह के ज्योतिषीय विकारों के चक्कर में पड़ा था। उस वक्त तक साधारण मध्यवर्गीय परिवारों में लड़कियों की जन्म कुंडली बनवाने का भी चलन नहीं हुआ करता था सो मेरी पत्नी की भी कोई जन्म कुंडली नहीं बनी थी। शादी से पहले पत्नी से मेरी कोई जान पहचान भी नहीं थी। समानता सिर्फ इतनी थी कि हमारा कालेज एक ही था। वे कानपुर के वीएसएसडी कालेज में संस्कृत में पोस्ट ग्रेजुएशन कर रही थीं और मैं मैथ्स में। शादी के लिए मेरे दादा का जोर था क्योंकि  उनके मुताबिक मैं कम्युनिस्ट पार्टी ज्वाइन करके पथभ्रष्ट होता जा रहा था।
ऐसा नहीं कि उस समय गोत्र, जाति और ग्रह नक्षत्र मिलाने का चलन नहीं था लेकिन उस पर इतना जोर नहीं हुआ करता था कि अच्छी खासी हो रही शादी ही तोड़ दी जाए। आज पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा में कितनी ही शादियां महज इसलिए नहीं हो पा रही हैं क्योंकि लड़का लड़की दोनों ही समगोत्री हैं। परंपरागत विश्वास साइंस नहीं है। संभव है भारत के खेतिहर समाज में लड़की को गांव के बाहर भेजने की सोच ने इस परंपरा को जन्म दिया हो। एक लंबे समय तक  भारत गांवों पर आश्रित रहा है। अब अगर लड़का लड़की एक ही गांव में शादी कर लेंगे तो सामाजिक दायरा सिमटता चला जाएगा इसलिए गोत्र यानी गांव के बाहर शादी करने का प्रचलन शुरू हुआ होगा। वैदिक कालीन समाज में एक ही आश्रम में रहने वाले लोग एक ही गोत्र के कहलाते थे। यानी एक तरह से पूरा गांव एक आश्रम ही होता था। इसीलिए गोत्र से बाहर शादी करने की परंपरा शुरू हुई। लेकिन जैसे जैसे समाज का स्वरूप बदलता गया यह आग्रह टूटता गया। आज एक एक गोत्र के लोगों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि समगोत्री लोगों में किसी भी तरह की पुरानी पारिवारिकता को ढूंढऩा बेमानी है।
गांवों में दो तरह की पंचायतें होती हैं। एक गांव पंचायत जो विधि सम्मत है और जिसके पदाधिकारी चुने जाते हैं। दूसरी जातीय पंचायतें जो अभी तक पुराने सामाजिक चौधरियों के बूते चल रही हैं। जातीय पंचायतें देश के किसी भी विधि विधान के दायरे में नहीं हैं, वे सामाजिक विश्वासों के बूते चल रही हैं। उनके फैसले पुराने कबीलाई समाज के फैसलों की तरह होते हैं। मानवीय गरिमा से ज्यादा महत्व उनके लिए कबीले के परंपरागत विश्वास और अलिखित कानून हैं। मसलन किसी का सामाजिक बहिष्कार या किसी का सिर मुंड़वा देना अथवा बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के दोषी व्यक्ति को पीडि़ता से शादी कर लेने का हुक्म देकर बरी कर देना जैसे फैसले ये पंचायतें देती रहती हैं। इसमें सजा की नरमाई अथवा कड़ाई व्यक्ति के अपराध से नहींं उसकी हैसियत से तय होती है। आज के समय में इन पंचायतों का कोई मतलब रह भी नहीं गया है।
जातीय पंचायतें एक जाति अथवा समुदाय की लड़ाई लड़ती हैं जबकि हमारा संविधान व्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए कटिबद्घ है। कोई किससे शादी करे अथवा कौन सा व्यवसाय चुने या किस दल को वोट दे, ईश्वर पर विश्वास करे या न करे, ईश्वरवादी हो तो किस धर्म में जाए यह उस व्यक्ति के अपने विवेक और सुविधा से तय होगा न कि समाज केे बंधन से। कोई पंचायत या जातियों के मुखिया उसे इस बात के लिए बाध्य नहीं कर सकते कि जो हमारा आदेश है वही मानो। मजे की बात तो एक तरफ तो हमारा समाज इतना उदार है कि वह खुद आगे बढ़कर घोषणा करता है कि पुरानी लीक को तोडऩा ही बेहतर है क्योंकि नया काम वही करते हैं जो लीक को तोड़ते हैं दूसरी तरफ ये जातीय पंचायतें पुराने ढर्रे पर चलती हुई लीक को पीटती रहती हैं।
इन पंचायतों का पुराने समय में क्या स्वरूप था इसे लेकर प्रेमचंद और रेणु ने दो अलग-अलग कहानियां लिखी हैं। प्रेमचंद की कहानी पंच परमेश्वर में गांव की एक ऐसी पंचायत का जिक्र है जिसमें बैठते ही जुम्मन शेख अलगू चौधरी के साथ अपनी वर्षों की दुश्मनी को भूल जाते हैं और अपने दुश्मन चौधरी के हक में फैसला देते हैं। वहीं फणीश्वर नाथ रेणु की पंच लाइट में कुर्मियों की एक पंचायत किसी तरह पैसा उगाह कर एक पेट्रोमैक्स खरीदती है। पेट्रोमैक्स कुर्मी पंचायत की जरूरत से ज्यादा उसके जातीय गुरूर को बनाए रखने के लिए आवश्यक है। इस पेट्रोमैक्स को लाने के बाद इसको जलाने के पहले उसकी पूजा की जाती है और छड़ीदार को सख्त हिदायत है कि पेट्रोमैक्स को बहुत आहिस्ता से लया ले जाया जाए। एक तरह से यह जातीय अस्मिता के झूठे और थोथे अभिमान की कहानी है। एक पेट्रोमैक्स को प्रतीक बनाकर रेणु ने लिखा है कि कैसे जातीय पंचायतें अपनी तथाकथित इज्जत को बचाने के लिए फिजूल की ड्रामेबाजी करती हैं। आज जब प्रेम के ऊपर जाति के पहरेदार बिठा दिए गए हैं तो रेणु की कहानी एकदम से समीचीन हो उठती है।
लोकतंत्र में गांव की पंचायतों की जरूरत तो हो सकती है लेकिन जातीय पंचायतें अब गैर जरूरी हो गई हैं। अंग्रेजों ने शहरों के विस्तार के लिए तमाम गांवों का औपनिवेशीकरण कर डाला था। उन्होंने अपनी जरूरतों के हिसाब से शहरों को फैलाया और गांवों को उनकी खोल में ही रहने दिया। लाल डोरा की अवधारणा अंग्रेजों ने इसी हिसाब से बनाई थी। दिल्ली को राजधानी चुनते वक्त अंग्रेजों के समक्ष सबसे बड़ी परेशानी दिल्ली के विस्तार की थी। दिल्ली के गंावों को चिन्हित कर अंग्रजों ने सबसे पहले नक्शे में गांवों को एक लाल रंग से घेर दिया और उनकी सारी खेतिहर जमीनों का अधिग्रहण कर लिया। अंग्रजों के पूरे मास्टर प्लान से दिल्ली के गांव गायब रहे। नतीजा यह हुआ कि दिल्ली शहर तो फैला लेकिन इसके गांव जस के तस बने रहे। दिल्ली में लाल डोरा आज भी हैं। आजादी के बाद आई सरकारों ने भी विकास के लिए वही अंग्रेजों वाला औपनिवेशिक ढांचा अपना लिया। इसी का नतीजा है कि शहर तो फैल रहे हैं लेकिन न गांव बदल  रहे हैं न वहां के लोगों के सोचने का नजरिया। ऐसे में यह सोचना बेमानी है कि जाति का दंभ पाले ये पंचायतें नए विचारों के अनुरूप अपने को ढाल पाएंगी।

जब नार्थी लड़के को दिल्ली में पीट-पीटकर मार डाला गया तो मुझे अपनी मेघालय यात्रा याद आ गई। साल २००० में मैं कोलकाता से गुवाहाटी गया था। कुल एक घंटे की फ्लाइट है। पर हवाई अड्डे से गुवाहाटी शहर काफी दूर था। रात गुवाहाटी रुका। वहां कुछ देखने को लायक था नहीं इसलिए अगले रोज शिलांग और चेरापूंजी जाने का मन बनाया। गुवाहाटी से एक घंटे से भी कम समय में हम मेघालय की सीमा में प्रवेश कर गए। जैसे ही मेघालय की सीमा में घुसे तो लगा कि मानों हम भारत छोड़कर यूरोप में आ गए हैं। साफ-सुथरी सड़कें और सड़क पर न गाय न भैंस न सुअर। इसी तरह न मंदिर न मसजिद। लगा कि नर्क हम काफी पीछे छोड़ आए हैं और वाकई देवताओं के लोक में आ गए हैं। मेघालय की सीमा में प्रवेश करते ही शराब की दूकान और शराब के विज्ञापनों ने आकर्षित किया पता चला कि यहां एक्साइज टैक्स नहीं है इसलिए शराब शेष भारत से काफी सस्ती है। अपना यूपी याद आया जहां पर लोग बताया करते थे कि हर बोतल व बोतली पर सीएम टैक्स व डीएम टैक्स भी देना पड़ता है। कुछ मोंटी चड्ढा टैक्स भी लगता था। माफ कीजिएगा मैने कभी शराब खरीदी ही नहीं है इसलिए मुझे इस पर पडऩे वाले टैक्सों का अंदाजा नहीं है। दूसरे हर कदम पर ढाबे और पान की दूकानें जिन्हें टखनों से नीचे की स्कर्ट पहने महिलाएं ही चलाती हैं। चाय पिएं या बियर बड़ी ही विनम्रता और सौजन्यता के साथ परोसती हैं। खाने के लिए चावल, अंडा करी और दाल। पान में कच्ची सुपारी जो मैदान का आदमी खा ले तो पलट जाएगा। मेरे साथ थे हमारे गुवाहाटी के संवाददाता श्री प्रभाकरमणि तिवारी और इंडियन एक्सप्रेस के गुवाहाटी स्थित रीजनल मैनेजर बोरदोलोई। जब हम शिलांग पहुंचे तो बारिश हो रही थी। शहर बहुत ही खूबसूरत है। शिमला, कश्मीर, नैनीताल अथवा मसूरी या दार्जिलिंंग से कहीं ज्यादा। वहां के सारे व्यापार पर मारवाडिय़ों का और ब्यूरोक्रेसी पर बंगाली भद्रलोक का कब्जा है। शिलांग को ही भारत में हिल सिटी का दरजा प्राप्त है।
मुझे वहां पर असम ट्रिब्यून के शिलांग स्थित विशेष संवाददाता ने बता रखा था कि रास्ते में कोई भी पूछे तो अपना पता दिल्ली का बताना कोलकाता का नहीं क्योंकि मेघालय के खासी लोग बंगालियों को पसंद नहीं करते और कभी-कभार हमला भी कर देते हैं। शिलांग के बाद हम चेरापूंजी गए। पांचवें दरजे से पढ़ते चले आए थे कि चेरापूंजी में बारिश सबसे ज्यादा होती है। हालंाकि अब ऐसा नहीं रहा। वहां पर हम उस स्थान पर गए जो भारत और बांग्लादेश की सीमा है। एक बड़ी सी खाई दोनों देशों को बांटती है। वहंा पर एक खासी महिला चाय की दूकान खोलकर बैठी थी। सो हमने वहां चावल खाया पर जैसे ही उसने पान दिया कि बोरदोलोई ने पान हाथ से खींच लिया। बोरदोलोई ने वह पान मेरे हाथ से खींचकर खुद खा लिया। मैं भौंचक्का। बोरदोलोई ने कहा कि सर यह पान खा कर आप यहीं गिर पड़ेंगे क्योंकि इसमें कच्ची सुपारी पड़ी है। उस चेरापूंजी कस्बे में पता चला कि रामकृष्ण मिशन का आश्रम है। पूरे मेघालय और शेष उत्तरपूर्वी भारत में रामकृष्ण आश्रम ही हिंदू धर्म की अलख जगाए हैं। वहां पर ये हिंदुत्व के नागपुरी प्रचारक नहीं दिखाई पड़ते।
मुझे लगता है कि अब अगर वहां जाना हो तो शायद यह बताना बड़ा खराब समझा जाएगा कि हम दिल्ली से आए हैं।
चेरापूंजी में सीमा पर मेरे साथ बोरदोलोई।

सोमवार, 3 फ़रवरी 2014

हाय बसंत! बाय बसंत!

दिल्ली की सरदी से ठिठुरता बसंत
शंभूनाथ शुक्ल
साल १९६५ की बात है। उस वर्ष २६ जनवरी को बसंत पंचमी पड़ी थी। मैं तब कानपुर के गोविंद नगर इलाके में स्थित गांधी स्मारक इंटर कालेज में छठी दरजे में पढ़ता था। स्कूल में  गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम में शरीक होने के लिए सुबह नौ बजे तैयार होकर मैं स्कूल पहुंचा। बसंत पंचमी होने के कारण मां ने पीले रंग की कमीज पहनने के लिए कहा। इस रंग की कोई शर्ट गरम कपड़े की तो थी नहींं इसलिए मलमल के कपड़े की शर्ट पहन कर स्कूल में गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम देखने गया। वहां मुझे एक कविता पढऩी थी। पता नहीं भूल वश अथवा प्रिंसीपल रामनायक शुक्ल के डर के कारण मेरे मुंह से गणतंत्र दिवस की बजाय स्वतंत्रता दिवस निकल गया। कार्यक्रम समाप्त हो जाने के बाद मुझे प्रिंसीपल रूम में बुलाया गया। मुझे लगा कि शायद पुरस्कार मिलेगा लेकिन वहां उपस्थित मेरी क्लास टीचर सुरजीत कौर ने बबूल की छड़ी से मेरी जमकर पिटाई की और कहा कि स्वतंत्रता दिवस १५ अगस्त को कहते हैं तथा २६ जनवरी को गणतंत्र दिवस। उस दिन यह लगा था कि काश आज कोई गरम कपड़ा पहन रखा होता तो छड़ी की पिटाई इतना दर्द न करती। पर बसंत पंचमी के साथ ही हम मान लेते थे कि अब गई सरदी इसलिए बसंत के साथ ही इक्का दुक्का स्वेटर ही पहने जाते रहे हैं।
लेकिन इस साल की बसंत पंचमी एकदम उलट रही। स्वेटर उतारना तो दूर चमड़े की जैकेट तक लोगों ने नहीं उतारीं। मेरी उम्र ५९ साल की हो चुकी है और मैने अब तक कभी बसंंत पंचमी के दिन इतनी सरदी नहीं महसूस की। बसंत पंचमी को सूरज की किरणें ताप देने लगती थीं। सुबह कुछ जल्दी होने लगती और शाम को भी सूरज ठिठकने लगता था। २२ दिसंबर को सबसे छोटा दिन होता है और उसी के बाद से दिन कुछ थमने लगता था इसीलिए २५ दिसंबर को बड़ा दिन भी कहा जाता है। पर इस बार मजा देखिए कि करीब एक महीने बीत जाने के बाद भी पता नहीं चला कि सूरज कितना ठिठका क्योंकि सूरज एक भी दिन निकला ही नहीं। २० दिसंबर से कोहरा पडऩा शुरू हुआ था और २ फरवरी तक बदस्तूर जारी रहा। इसलिए बसंत के आने की खुशी मनानी दूभर हो गई।
बसंत पंचमी से आम के पेड़ों में बौर आने लगती है। बसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा की परंपरा बंगाल के ब्राह्मïो लोगों ने डाली वरना इसके पहले बसंत पंचमी से मदनोत्ससव मनाने की परंपरा चली आ रही थी। मदनोत्सव होली तक अनवरत चलता था। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने बाणभट्ट की आत्मकथा में मदनोत्सव का व्यापक वर्णन किया है जो इसी बसंत पंचमी के दिन से शुरू होता था। कालिदास ने ऋतुसंहार में बसंत यानी मधुमास का वर्णन अत्यंत लावण्यमय तरीके से किया है। रांगेय राघव द्वारा उसके अनुवाद में यह वर्णन कुछ इस तरह है-
प्रिये मधु आया सुकोमल,
तीक्ष्ण गायक-आम और प्रफुल्ल की कर में उठाए।
भ्रमर माला की मुकर अभिराम प्रत्यंचा चढ़ाए।
सुरत सर से हृदय को करता विदग्ध विदीर्ण व्याकुल।
प्रिये! वीर बसंत योद्घा आ गया मदपूर्ण चंचल।
कालिदास ने बसंत के साथ ही गरमी की आहट का संकेत समझा। यूं भी भयंकर शीत के बाद मधुमास का आगमन चित्त को ऊष्मा देता है। हिंदी कवि निराला ने भी जूही की कली में बसंंत को कोमल और मन को हरषाने वाला बताया है।
सखि बसंत आया,
भरा हर्ष वन के मन,
नवोत्कर्ष छाया।
किसलय-वसना नव लय-लतिका
मिली मधुर प्रिय उर तरु पतिका,
मधुप वृन्द बन्दी,
पिक स्वर नभ सरसाया।
यह सच है कि इस साल बसंत पंचमी ४ फरवरी को पड़ गई। यह हर साल बदला करती है क्योंकि अपने यहां परंपरा से जिस विक्रमी कलेंडर से तिथियां मान्य हैं वह चंद्रमा की गति से चलता है। चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा २७.३ दिनों में पर पृथ्वी की आकृति वलयाकार होने के कारण कभी वह इसे २९.५ दिन में पूरी कर पाता है। इसलिए चंद्रमास से हर महीना कुछ न कुछ दिन घटता बढ़ता रहता है और इसे पूरा करने के लिए हर दो साल के अंतराल के बाद अधिमास मना कर ऋतुओं को यथावत कर लिया जाता है। दूसरी तरफ सूर्य गणना से बना गे्रगेरियन या ईस्वी कलेंडर झंझटी भले कम दिखता हो लेकिन उसकी गणना में भूमंडलवाद ज्यादा है सटीकता कम। खगोल शास्त्र के विद्वानों का कहना है कि  ईस्वी कलेंडर में गणना सही नहीं है क्योंकि  पृथ्वी ३६५ दिन ५ घंटे ४९ मिनट और १२ सेकेंड में सूर्य की परिक्रमा पूरी करती है। सूर्य की परिक्रमा की इस अवधि को एक वर्ष बताया गया है। अब ये ५.४९.१२ घंटे तो जोड़कर हर चौथे साल फरवरी २९ दिनों की कर दी जाती है। लेकिन सेकेंंड की गणना इस कलेंडर में छोड़ दी गई है। पर एक न एक  दिन तो यह गणना उलट-पलट जाएगी। इसकी काट अभी तक नहीं तलाशी गई है। यही तो भूमंडलीकरण है कि जब संकट आएगा तब ही उसका समाधान खोज लिया जाएगा इसलिए जैसा चल रहा है चलने दो।
चंद्रमास की तिथियों से बंधे होने के कारण ही इस साल बसंत पंचमी जनवरी की २० तारीख को पड़ गई। लेकिन विक्रमी कलेंडर में अधिमास की मान्यता मिली होने के कारण इस कलेंडर के आधार पर मनाए जाने वाले त्योहार ऋतुओं के आधार पर आते हैं। मसलन दीपावली सरदी की शुरुआत में ही आएगी और होली गरमी की आहट के साथ। भले वे त्योहार अंग्रेजी कलेंडर के हिसाब से १०-१५-२० दिनों के हेरफेर से पड़ें। चूंकि भारत ऊष्ण कटिबंधीय देश है इसलिए यहां के प्रचलित कलेंंडरों में अधिमास की परंपरा न होती तो बड़ा मुश्किल हो जाता। कैसा अजीब लगता जब दीपावली बरसात में और होली शिशिर में पड़ रही होती।
एक बहुरंगी और किसी नियम के बंधनों से न जुड़े होने का फायदा भारतीय समाज को मिला हुआ है। यहां धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को बराबर की हैसियत प्राप्त है इसलिए काम को भी यहां वही नैतिक मान्यता है जो धर्म को है। लेकिन १९वीं शताब्दी के रेनेसाँ से शुरू हुए नैतिकतावादियों ने त्योहारों की परंपरा को कुछ अलग किस्म का बना दिया। जिसका नतीजा यह हुआ कि त्योहारों में उल्लास और मादकता कम उनमें कर्मकांड ज्यादा जुड़ गया।
बसंत पंचमी को सर्दी का कम न हो पाने से अब यह डर तो सताने ही लगा है कि क्या कोपेनहेगेन का भूत अब भारतीय त्योहारों में भी घुस गया है और हम वाकई ग्लोबल चिल्लड के शिकार हो गए हैं जो बसंत जैसा त्योहार भी भयानक शीतलहर में गुजरा। पंजाब से लेकर बांग्लादेश तक यह त्योहार अलग-अलग अंदाज में मनाया जाता है। कहीं सरस्वती पूजा तो कहीं सरसों के बिरवे की पूजा लेकिन यह सच है कि सभी जगह इस त्योहार में मस्ती का आलम मौजूद रहता है।

कोहरे का कहर

सावधान! आगे घना कोहरा है
शंभूनाथ शुक्ल
कोहरे की चादर ने पूरे उत्तर भारत को घेर रखा है। कश्मीर घाटी से लेकर उत्तरी व पूर्वी प्रदेशों के सुदूर इलाकों तक कोहरे की सफेद चादर फैली है। दृश्यता लगभग शून्य है। ट्रेनें, हवाई जहाज और सड़क परिवहन अस्त-व्यस्त है। लेकिन देखिए कि प्रकृति की यह निर्ममता भी जीवन की गति को जरा भी रोक नहीं पाती है। अलस्सुबह टहलने निकले बुजुर्गों से लेकर स्कूल जाते बच्चों और नौकरी पर निकले लोगों की रेलमपेल सड़कों पर वैसी ही व्यस्तता बनाए रखती है जैसी कि आम दिनों में होती है। घने कोहरे में सड़क पर गाड़ी चलाते हुए लगता है कि काश! हमारी आँखें कोहरे की चादर के पार देख सकतीं। हमें नहीं पता कहां कोई डंफर यमदूत बनकर हमें लील जाए अथवा कोई ट्रैक्टर अपनी ट्राली समेत हमारी गाड़ी के ऊपर आ गिरे। सड़क सरकार ने बनवा दी है पर सड़क पर चलने वालों की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है।
हमारे एक सहकर्मी हैं जो अरसे तक नार्वे में रहे हैं। जिन्हें योरोप की भौगोलिक स्थिति का ज्ञान होगा उन्हें यह ज्ञात होगा कि नार्वे उत्तरी ध्रुव के पास का ऐसा भूभाग है जहां साल में छह महीने सूरज नहीं डूबता और बाकी में निकलता नहीं है। इसके बावजूद इस छोटे से देश के वासियों ने अपनी मेहनत, लगन और जिजीविषा के बूते प्रकृति की इस निर्ममता के खिलाफ एक ऐसा तंत्र विकसित कर लिया है कि नार्वे उन विकसित मुल्कों में से है जो दुनिया भर को अपनी जाने कितनी चीजें निर्यात करता है और बदले में खाद्य सामग्री खरीदता है। हमारे वो सहकर्मी बताते हैं कि नार्वे में सोशल सिक्योरिटी इतनी ज्यादा है कि कुछ वर्षों वहां काम करने की एवज मेें उन्हें ६२ साल की उम्र के बाद नार्वेजियन मुद्रा में इतनी ज्यादा पेंशन मिलेगी जिसकी कीमत यहां कोई १०५००/- महीना होती है। अब इसके उलट जरा अपने यहां की बानगी देखिए। नए साल के पहले ही दिन हावड़ा से दिल्ली आने वाली सारी ट्रेनें दस से बीस घंटे तक की देरी से चल रही थीं। आगरा से ग्रेटर नोएडा तक बने यमुना एक्सप्रेस वे पर सौ किमी लंबा जाम लगा था। मालूम हो कि इस मार्ग पर १६५ किमी की दूरी तय करने के लिए ३२० रुपये टोल टैक्स देना पड़ता है। लेकिन सुविधा के नाम पर सिफर।
हर साल कोहरे में ट्रेनें टकराती हैं। मंहगे टोल वाले राजमार्गों पर कारें, बसें, ट्रक तो भिड़ते ही रहते हैं। सैकड़ों लोग हर साल इन दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवाते हैं। हवाई सेवाओं का तो बुरा हाल है। कभी बारिश के चलते फ्लाइट रद्द होती है तो कभी कोहरे के कारण और अगर मौसम एकदम साफ रहा तो भी रन वे पर कंजेशन के चलते आसमान में ही जहाज चक्कर लगाया करते हैं। नतीजा यह होता है कि मुंबई से दिल्ली का सफर दो घंटे के बजाय तीन से चार घंटों के बीच पूरा हो पाता है। लेकिन सरकार को जनता की इन तकलीफों से कोई वास्ता नहीं होता। प्राकृतिक आपदा बताकर सरकार अपना पल्ला झाड़ लेती है। क्या कोहरा, बारिश या सूखे को सिर्फ इसलिए अनदेखा किया जाए क्योंकि ये प्राकृतिक आपदाएं हैं। क्या सरकार की कोई जवाबदेही नहीं बनती कि प्रति वर्ष नियम से आने वाली इन आपदाओं से लडऩे के लिए कोई सटीक वैज्ञानिक पहल की जाए। हाल में तिरुअनंतपुरम में हुई साइंस कांग्रेस में अंतरिक्ष में विजय यात्रा की स्तुति तो की गई लेकिन इस पर रत्ती भर विचार नहीं हुआ कि हमारे देश की इन प्राकृतिक विपदाओं से कैसे निपटा जाए।
एक छोटा सा मुल्क नार्वे साइंस में भी हमसे कहीं आगे है। हम अंतरिक्ष तथा दक्षिणी और उत्तरी ध्रुव की अपनी विजय यात्राओं का कितना भी स्तुतिगान करते रहें लेकिन योरोप का हर देश वहां पहले से झंडा गाड़े है। लेकिन ये मुल्क अपने देश के वासियों को यह भरोसा भी देते हैं कि आपकी सुरक्षा की गारंटी भी हमारे पास है। घने कोहरे में भी वहां के विमान सकुशल लैंडिंग करते हैं और त्वरित सेवाओं के बावजूद उनके रन वे पर इतनी जगह होती है कि विमान समय पर उतर जाएं। हर ट्रैक पर वाहन सुरक्षित गुजरते हैं। योरोप ही नहीं  एशिया में भी चीन, जापान, मलेशिया, इंडोनेशिया और कोरिया तक प्रकृति की विभीषिकाओं से हमारी तुलना में ज्यादा सुगमता और सहजता से लड़ लेते हैं लेकिन हमारे देश में अभी जनता को मूलभूत सुविधाएं तक मुहैया नहीं हैं। चीन और जापान में बुलेट ट्रेन की रफ्तार इतनी है कि दिल्ली से कानपुर तक की दूरी को महज ७५ मिनट में पूरा किया जा सकता है और यहां हालत यह है कि रात ९.२० पर दिल्ली से छूटी प्रयागराज कानपुर के आउटर स्टेशन पनकी से सुबह ८.४० पर खिसकी। यानी ग्यारह घंटों से भी ज्यादा समय में गाड़ी कुल लगभग ४२५ किमी का सफर ही तय कर पाई जबकि प्रयागराज एक्सप्रेस द्रुत गति वाली ट्रेन है और उसमें सफर करने के लिए अतिरिक्त पैसा देना पड़ता है।
यह लज्जा की बात है कि हमारी सरकारें अभी तक देश के लोगों को किसी भी तरह की सुरक्षा की गारंटी नहीं प्रदान कर पाई हैं। यहां तक कि उनके मूलभूत अधिकारों की गारंटी भी। जिस मुल्क में आदमी इसलिए सड़क पर न निकले कि पता नहीं कब कोहरा, आँधी या तूफान उसका रास्ता रोक ले या कब उन मार्गों पर भी उसे विपदाओं का सामना करना पड़ जाए जिन पर से गुजरने के लिए उसे अतिरिक्त कर देना पड़ता है या इन सारे करों के भुगतान के बावजूद भी उसे कोई सामाजिक सुरक्षा न मिले तो कहना ही होगा हम शर्मिंदा हैं।

शनिवार, 1 फ़रवरी 2014

औघड़ लेखक हैं खुशवंत सिंह!

औघड़ लेखक हैं खुशवंत सिंह!
शंभूनाथ शुक्ल
खुशवंत सिंह और मेरे में जमीन आसमान का फर्क है। कह सकते हैं कि वे राजा भोज और मैं गंगू तेली। वे जिस रईसी में पैदा हुए और जिस तरह के तथा जैसे नामी गिरामी स्कूलों में पढ़े उनमें तो मैं घुस तक नहीं सकता। वे जहां रहते हैं अक्सर मैं उस सुजान सिंह पार्क को हसरत भरी निगाहों से देख लेता हूं। लेकिन उनकी पत्रकारिता और उनकी बेबाक जीवनशैली का मैं कायल हूं। खुशवंत सिंह कतई कट्टर नहीं हैं। वे एक अकाली सिख हैं पर गायत्री मंत्र पढ़ते हैं, प्रवेश द्वार पर गणपति की प्रतिमा लगा रखी है और कृपालु जी महाराज उनके पसंदीदा साधु थे। वे एक जमाने में इंदिरा गांधी के करीबी रहे पर आपरेशन ब्लू स्टार के बाद से वे इंदिरा जी पर शक करने लगे और उन्हें लगने लगा कि यह महिला कट्टर ब्राह्मणी ही है। वे अटलबिहारी बाजपेयी के उदार राजनीतिक विचारों और खानपान शैली के प्रशंसक रहे हैं और खुल्लमखुल्ला आडवाणी की भी तारीफ कर दी।
उनके बल्ब को मैने पूरी तईं पढ़ा है। और एक बार जब उन्होंने अपने बल्ब में कानपुर की तमाम बुराइयां कीं। तो मुझे बहुत खराब लगा और मैने उस समय के दैनिक जागरण के संपादक कम मालिक श्री नरेंद्र मोहन से अनुरोध किया कि वे खुशवंत सिंह के बल्ब को छापना बंद कर दें क्योंकि यह कितना खराब लगता है कि आप कानपुर के नंबर वन अखबार हो और आपके यहां ऐसा लेख छपे जिसमें कानपुर की  घोर निंदा की गई है। पर मोहन बाबू को अपना व्यवसाय और व्यावसायिक हित प्यारे थे उन्होंने मेरा सुझाव ठुकरा दिया। तो मैने जनसत्ता में एक लेख लिखा कि वे बेचारे क्या जान पाएंगे कानपुर की जिंदादिली। और कानपुर के प्रति जागरण की इस अवहेलना को भी छापा। मैने अपने लेख में खुशवंत सिंह की खूब लानत-मलामत की। यह शायद १९९१ का साल रहा होगा। जनसत्ता की तब तूती बोला करती थी और चाहे हिंदी का लेखक हो अथवा अंग्रेजी का जनसत्ता जरूर पढ़ता था। दुख है कि इसके पहले और जनसत्ता के संस्थापक संपादक प्रभाष जोशी की मृत्यु के बाद यह रुतबा किसी हिंदी अखबार को नहीं मिला। हालांकि आनंदबाजार पत्रिका और समाज व दिनमणि जैसे वर्नाक्यूलर भाषाओं में निकलने वाले अखबार अपने-अपने प्रदेशों के अभिजात्य वर्गों में खूब पसंद किए जाते हैं पर हिंदी को यह सौभाग्य सिर्फ प्रभाष जोशी वाले जनसत्ता के दिनों में ही मिला था।
खुशवंत सिंह जी ने जनसत्ता में छपा मेरा वह लेख पढ़ा और प्रभाष जी को फोन कर  मेरे बारे में पूछताछ की। फिर बोले कि उस लड़के को कह दो कि कभी आकर मिल ले। प्रभाष जी ने मुझसे कहा कि खुशवंत सिंह तुमसे बहुत नाराज हैं। मैने कहा यह तो होना ही था। बोले- जाकर  मिल लो। खैर, एक दिन मैं पहुंच गया उज्बक की तरह उनके आवास पर। परिचय दिया तो बोले- अच्छा लिखते हो। और लिखो तथा अपने शहर को पसंद तो करते हो लेकिन कुछ उसके लिए करो भी सिर्फ लिखने से कुछ नहीं होने वाला। बात सही थी। मेरा लेख बस गुस्से का इजहार भर था। तत्काल लगा कि कुछ भी हो खुशवंत सिंह गजब के इंसान हैं। आज वे अपनी उम्र के ९९ साल पूरे कर सौवें साल में प्रवेश कर रहे हैं। ऐसे औघड़ लेखक के लगातार सक्रिय बने रहने के लिए मेरी शुभकामनाएं। अब उन्हें सौ साल जीने की शुभकामना देना तो उनका अपमान है। उनके बारे में कहा जाना चाहिए कि जिया तू हजार साला!

शनिवार, 11 जनवरी 2014

गंगा दर्शन

जो बहती है वह गंगा माँ है!
गंगा की अविरल धारा को देखकर मेरी भी आँखें ठीक उसी तरह भीग जाती हैं जैसी कि पंडित जवाहरलाल नेहरू की भीगा करती थीं। पंडित जी अक्सर इलाहाबाद में संगम तट पर जाते और वहां त्रिवेणी की धारा को देखकर सोचा करते कि गंगा ही हमारी सभ्यता और संस्कृति है। अगर गंगा नहीं होती तो ये गंगा जमना का मैदान नहीं होता और हमारे चिंतन प्रक्रिया में वह विविधता नहीं आती और न ही सद्भाव आता जो यहां मौजूद है। सोचिए गंगा ने हमें कितना कुछ दिया है। वह अल्हड़ता, वह मस्ती और फक्कड़ी जिसके चलते हमारी चिंतन प्रक्रिया में असहिष्णुता और उदारता आई जो देश मेें और कहीं नहीं है क्योंकि बाकी सब जगह का मौसम सम है और वहां एकरस जीवन है। गंगा की धारा के साथ बहना और उसके उद्गम स्थल गोमुख से लेकर गंगा सागर तक मैं कई दफे गया हूं। मैं कोई छद्म राष्ट्रवादी नहीं हूं कि गंगा सफाई जैसे कुतर्की अभियान चलाऊँ या विकास की धारा को अवरुद्ध करने की नीयत से गंगा की धारा को अपने तईं स्वच्छ करने का दंभ पालूं। विश्व में गंगा को कोई भी अनंत काल से नहीं बांध पाया है क्योंकि गंगा एकमात्र जीवित देवता हैं। इसलिए उन्हें पवित्र करने का दंभ कुछ छद्म और झूठे राष्ट्रवादी ही पालते हैं। जिस गंगा के प्रवाह पर मुग्ध होकर पंडित जगन्नाथ ने गंगा लहरी और आदि शंकराचार्य ने गंगा स्त्रोत रचा वह गंगा किसी छद्म व भ्रम में नहीं बहती है। वह बहती है क्योंकि बहना उसकी निरंतरता का द्योतक है। मूर्ख हैं जो गंगा के खत्म होने से डरे हुए हैं। गंगा तब ही खत्म होगी जब यह सृष्टि खत्म होगी। वह अपना रास्ता खुद तय करती है, अपने बांधने के अभियान से खुद रुष्ट होती है और प्रलय ढा देती है। इसलिए गंगा को बचाने अथवा उसे साफ करने का अभियान बेमानी है। चलाना है तो सुंदर लाल बहुगुणा की तरह गंगा के रुष्ट नहीं होने का अभियान चलाओ। पर मजा देखिए कि एक तरफ तो वाराणसी में गंगा सफाई अभियान चलाया जाता है दूसरी तरफ टिहरी में उसे अवरुद्ध करने की प्रक्रिया भी वही राष्ट्रवादी करते हैं। मैं स्वयं मगर गंगा के साथ ही बहना चाहता हूं। जब भी मौका मिलता है मैं निकल जाता हूं गंगा के सहारे-सहारे उसके बहाव की उल्टी दिशा में। इस नदी को देखने का एक मजा काशी में है तो एक उत्तरकाशी में। उत्तरकाशी के निकट नैताला में गंगा के बहाव के सहारे मैं भी अपनी जीवनगंगा बहाने का इच्छुक हूं।

मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

बुद्धदेब भट्टाचार्य की सादगी

सादगी का यह एक उदाहरण!
जब वह कलकत्ता था तब मैं वहां अलीपुर में रहता था। इंडियन एक्सप्रेस समूह में तब संपादक के लिए सुसज्जित आवास का इंतजाम कंपनी ही करती थी। पर कुछ संकट की वजह से मुझे रहने के लिए आरएनजी (दिवंगत श्री रामनाथ गोयनका) का कलकत्ता में अलीपुर स्थित आवास दे दिया गया था। हालांकि आरएनजी की मृत्यु के बाद उसे गेस्ट हाउस ही बना दिया गया था। करीब ढाई एकड़ में फैले उस विशालकाय बंगले में मेरी हैसियत उस झींगुर जैसी ही थी जो स्वर्णाभूषणों के किसी डिब्बे में बैठ गया हो। वहां पड़ोस में सिंघानिया, खेतान. विमल जालान, साहू जैन जैसे मारवाड़ी सेठ लोग रहते थे। किसी से पड़ोस में अभिवादन तक करने की औकात आर्थिक रूप से कंगले इस संपादक में नहीं थी। पर एसी एम्बेसडर कार जरूर दी गई थी, ड्राईवर भी। बंगले में कुक समेत हर तरह की सेवा को हाज़िर नौकर थे। वहां महराज यानी कुक (मारवाड़ी अपने कुक को "महराज" के संबोधन से बुलाते हैं। शायद इसलिए कि ये कुक ब्राह्मण ही रखे जाते हैं। मेरा कुक ओडिया ब्राह्मण था और एकदम चीकट जनेऊ पहने रहता था। बेहद गरीब लेकिन गज़ब का वफादार और हद दर्जे का मेहनती।) मेरे लिए तो अच्छी क्वालिटी का "अरवा" चावल बनाता लेकिन अपने और अन्य नौकरों के लिए "उसना"। एक दिन यह पता चलने पर मैंने उससे कहा कि यह अन्नाय है, तो वह बोला- "बाबू यही चलता आया है"। बाद में मैंने अपने कारपोरेट एडिटर श्री Om Thanvi से कहकर अपने लिए दूसरे आवास का प्रबंध करा लिया। मेरा यह आवास साल्ट लेक में था। मैं वहां शिफ्ट हो गया। साल्टलेक में मुख्यमंत्री ज्योति वसु भी रहते थे। उनके बंगले के ठीक सामने सेंट्रल पार्क था। जहाँ सुबह आठ बजे तक एंट्री फ्री थी और उसके बाद 5 रुपये फी आदमी। अब मैं ठहरा अख़बार का आदमी, सो कर ही 8 बजे उठता और रोजाना 5 रुपये देना खलता। एक दिन मैंने देखा कि ज्योति बाबू अपने लॉन में एक कुर्सी डाले बैठे अखबार पढ़ रहे हैं। मैं लपक कर उनके पास गया और अपनी गलत-सलत अंग्रेजी में अपनी व्यथा कह डाली। अब ज्योति बाबू ने जैसा भी समझा हो पर यह जरूर कर दिया कि मेरी एंट्री वहां 8 के बाद भी फ्री कर दी गई। और जब वह कोलकाता हो गया तब मुख्यमंत्री हुए बुद्धदेब भट्टाचार्य। उनसे मेरी एक बार नन्दन में दोस्ती हो गयी थी। तब भी वह वेस्ट बंगाल के गृह मंत्री थे तथा धोती-कुरता और चप्पल पहने वे रोजाना नन्दन में दिख जाया करते। वे तब दो कमरे के एक सरकारी फ्लैट में रहते थे और उनकी पत्नी शायद किसी कालेज में लायब्रेरियन थीं। मैं नन्दन में एक बार उनसे मिला। अपना परिचय देते हुए जैसे ही मैंने उन्हें बताया कि "सर आई फ्रॉम कानपुर", वे फ़ौरन बोले- "ओह द सिटी ऑफ़ कामरेड रामासरे", मैंने कहा "जी"। उसके बाद तो ऐसे सम्बन्ध बने कि उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बाद पहला इंटरव्यू मुझे ही दिया। और उसे इंडियन एक्सप्रेस ने भी हिंदी से अंग्रेजी में उल्था कर छापा। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी बुद्धदेब बाबू उसी फ्लैट में रहे और उनकी पत्नी पहले की तरह ही बस से ही आती-जाती रहीं और उनकी बेटी भी अपने कालेज बस या ट्राम से ही जाती। वहां कितनी बार ऐसा हुआ कि मुख्यमंत्री राइटर्स बिल्डिंग स्थित अपने कक्ष में मेरा इंतजार करते। ऐसी सादगी और विनम्रता दिखा पाएंगे "आप" के लोग?